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| 05.31.2008 |
| इतना भी ज़ब्त मत कर कवि कुलवंत सिंह |
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इतना भी ज़ब्त मत कर आँसू न सूख जाएँ
दिल में छुपा न ग़म हर आँसू न सूख जाएँ कोई नहीं जो समझे दुनिया में तुमको अपना रब को बसा ले अंदर आँसू न सूख जाएँ अहसास मर न जाएँ, हैवान बन न जाऊँ दो अश्क हैं समंदर आँसू न सूख जाएँ मंजर है खूब भारी अपनों ने विष पिलाया देवों से गुफ़्तगू कर आँसू न सूख जाएँ कैसे जहाँ बचे यह आँसू की है न कीमत दुनिया बचा ले रोकर आँसू न सूख जाएँ |
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