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| 01.16.2009 |
| इस गँवार को ! कवि कुलवंत सिंह |
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हो भूख से बेजार बढ़ाकर जब कोई हाथ
उतारता स्वर्ण मुद्रिका जल रही चिता के हाथ तो इस गँवार को भी यह बात समझ आती है । लेकिन रहने वाले ऊँची अट्टालिकाओं में सेकते हैं रोटियाँ जब जल रही चिताओं में तो इस गँवार को भी यह बात गवारा नहीं है । भरसक मेहनत के बाद जब एक श्रमिक के हाथ जुटा पाते न रोटी दो वक्त की एक साथ चुराना एक रोटी का मुझे समझ आता है । माँ, पत्नी की लाश पर कर रहे हैं जो नग्न नृत्य जमीन जायदाद खातिर कर रहे जो भर्त्स कृत्य यह बात इस गँवार को नागवार गुजरती है । गाँवों में साधन नहीं, कमाई का ठौर नही शहरों में भाग आते चार पैसे मिलें कहीं बदहाल सा जीना उनका समझ आता है । लेकिन शहरों से जा खेतों पर कब्जा करना एक साथ सैकड़ों किसानों की जमीन छिनना मुझे क्या किसी भी गँवार को समझ आता नहीं । कलेजे पर रख पत्थर भेज विदेश बच्चों को स्वर्णिम भविष्य देने की चाहत लाडलों को बुढ़ापे में खुद को ढोना समझ आता है । लेकिन उन लाडलों का क्या जो छीन कर सब कुछ बेघर कर देते बूढ़े माँ बाप को समझ तुच्छ गँवार को लगता खूब सयाने वो लाडले हैं । पिता का हाथ बँटाता बचपन खेत खलिहान में माँ का हाथ बँटाता बचपन घरों के काम में गँवार को क्या समझदार को भी समझ आता है । लेकिन बचपन खुद को कांधों पर धर जीता है होटलों, दुकानों, सड़कों, फैक्ट्रियों में पलता है लगता गँवार को हुई बेमानी जिंदगी है । कायर बन जो जीते हैं, शांति शांति जपते हैं कातर बोल रखते हैं, अपमान भी सहते हैं दमन इन जातियों का एक दिन समझ आता है । किंतु ब्याघ्र बन जो छोटे राष्ट्र निगल जाते हैं दूसरे देशों की भी बागडोर चलाते हैं इस गँवार के पल्ले तो कुछ भी नही पड़ता है । नेता बनने से पहले वह खाना खाते हैं राजनीति में जमने पर बस पैसा खाते हैं नेताओं का करोड़पति बनना समझ आता है । लेकिन आम जनता त्रस्त, अपमान सहती रहे भूख, गरीबी, जुल्म, भ्रष्टाचार से भिड़ती रहे देश को बेचें नेता, गँवार समझ पाता नहीं । अरे समझदारों ! इस गँवार को भी समझा दो ऊट पटांग हरकतों को भेजे में घुसवा दो गर नहीं तो इस गँवार को मूर्ख ही बतला दो । |
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