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01.16.2009
 
 होली आयी रे!
कवि कुलवंत सिंह

झनन-झनन नाचो रे, खुशियाँ मनाओ रे,

आज होली फिर से आयी रे!

 

गुलाल की बहार है, रंगों की फुहार है,

चारों ओर छायी मस्त बहार है।

गलियों में फैला इंद्रधनुषी रंग है,

बच्चे बूढ़े औ जवां, सबमें आज उमंग है।

झनन-झनन नाचो रे खुशियाँ मनाओ रे,

आज होली फिर से आयी रे!

 

फागुनी हवाओं में दुनिया रँगी है,

चेहरों पे सबके आज उल्लास और हँसी है।

ढोलक की थाप पे थिरके हैं कदम

अब तक थे दूर देखो बने हैं हमदम।

झनन-झनन नाचो रे खुशियाँ मनाओ रे,

आज होली फिर से आयी रे!

 

गोरी के गाल पे लाल गुलाल है,

पिया अंग लग-लग हुई मालामाल है।

अंखियन से तक-तक मारे पिचकारी है,

संवरिया ने डाला रंग भीगी आज चोली है।

झनन-झनन नाचो रे खुशियाँ मनाओ रे,

आज होली फिर से आयी रे!

 

बैर भाव भूले सब एक ही पहचान है,

टेसू के रंगों में रँगा जहान है।

धरती नाचे, अंबर नाचे, भंग की तरंग है,

जीवन में सबके आज रंग ही रंग है।

झनन-झनन नाचो रे खुशियाँ मनाओ रे,

आज होली फिर से आयी रे!


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