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04.16.2012
 

दोहे - धरम के
कवि कुलवंत सिंह


 शुद्ध धरम बस एक है, धारण कर ले कोय।
इस जीवन में फल मिले, आगे सुखिया होय॥

सत्य धरम है विपस्सना, कुदरत का कानून।
जिस जिस ने धारण किया, करुणा बने जुनून॥

अणु अणु ने धारण किया, विधि का परम विधान।
जो मानस धारण करे, हो जाये भगवान॥

अंतस में अनुभव किया, जब जब जगा विकार।
कण - कण तन दूषित हुआ, दुख पाये विस्तार॥

हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख हो, भले इसाई जैन।
जब जब जगें विकार मन, कहीं न पाये चैन॥

दुनियादारी में फंसा, दुख में लोट पलोट।
शुद्ध धरम पाया नही, नित नित लगती चोट॥


मैं मैं की आसक्ति है, तृष्णा का आलाप।
धर्म नहीं धारण किया, करता रोज़ विलाप॥

माया पीछे भागता, माया का अभिमान।
माया को सुख मानता, धन का करे न दान॥

गंगा बहती धरम की, ले ले डुबकी कोय।
सच्चा धरम विपस्सना, जीवन सुखिया होय॥

तप करते जोगी फिरें, जंगल, पर्वत घाट।
काया अंदर ढूँढ ले, तीन हाथ का हाट॥

अपनी मूरत मन गढ़ी, सौ सौ कर श्रृंगार।
जब जब मूरत टूटती, आँसू रोये हज़ार॥

पत्नी, माता, सुत, पिता, नहीं किसी से प्यार।
अपने जीवन में सभी, स्वार्थ पूर्ति सहकार॥


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