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| 05.31.2008 |
| अच्छाई और बुराई कवि कुलवंत सिंह |
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जो अच्छाईयाँ हैं तुममें -
सर्वत्र बिखेर दो ! महका दो - गुलाब की तरह! जो पाये - अपना ले ! महक मिले जिसे - बहक जाए ! बस अच्छाईयाँ बिखराए। जो बुराईयाँ हैं तुममें - उन्हें समेट लो ! दबा दो - कफन में ! सुला दो - चिर निद्रा में ! न उठने पाएँ, न दिखने पाएँ, न दूसरों को बहका पाएँ! |
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