अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
01.16.2009
 

अभिलाषा
कवि कुलवंत सिंह


बन दीपक मैं ज्योति जगाऊँ
अँधेरों को दूर भगाऊँ,
दे दो दाता मुझको शक्ति
शैतानों को मार गिराऊँ ।

बन पराग कण फूल खिलाऊँ
सबके जीवन को महकाऊँ,
दे दो दाता मुझको भक्ति
तेरे नाम का रस बरसाऊँ ।

बन मुस्कान हँसी सजाऊँ
सबके अधरों पर बस जाऊँ,
दे दो दाता मुझको करुणा
पाषाण हृदय मैं पिघलाऊँ ।

बन कंपन मैं उर धड़काऊँ
जीवन सबका मधुर बनाऊँ,
दे दो दाता मुझको प्रीति
जग में अपनापन बिखराऊँ ।

बन चेतन मैं जड़ता मिटाऊँ
मानव मन मैं मृदुल बनाऊँ,
दे दो दाता मुझको दीप्ति
जगमग जगमग जग हर्षाऊँ ।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें