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| 01.16.2009 |
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अभिलाषा |
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बन दीपक मैं ज्योति जगाऊँ बन पराग कण फूल खिलाऊँ बन मुस्कान हँसी सजाऊँ बन कंपन मैं उर धड़काऊँ बन चेतन मैं जड़ता मिटाऊँ |
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