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09.09.2007
 
टूटता जल तरंग
कृष्णानन्द कृष्ण

शाम होते ही फिराया लाल चौक का मौसम ही बदल जाता है। वो भी गर्मी की शाम हो तो कहना ही क्या? नरेन्द्र अपनी पत्नी और बेटी कविता के साथ फिराया लाल की दुकान में कपड़े देख रहा था। भीतर-भीतर उसका मन बहुत बेचैन था। वे लोग अभी तक नहीं आये थे? पता नहीं आयेंगे भी या नहीं?

तभी नमस्ते की आवाज से नरेन्द्र का ध्यान भंग हुआ। देखा सामने वे लोग खड़े मुस्कुरा रहे थे।

कविता ने भी तिरछी नजरों से आनेवाले सज्जन और महिला की ओर देखा।

नरेन्द्र को उनलोगों ने आश्वस्त किया कविता उन्हें पसन्द है। नरेन्द्र के भीतर एकाएक जल तरंग बज उठा।

बहन जी! कम-से-कम आप भी लड़के को देख लें। वो सॉफ्टी कॉर्नर के पास क्रीम कलर के सफारी में खड़ा है। आगन्तुक महिला ने कहा।

कविता ने आगन्तुक महिला की बात सुनकर अपनी दृष्टि सॅाफ्टी कॅार्नर की ओर दौड़ाई। युवक पर नजर पड़ते ही उसके भीतर कुछ खौलने लगा। तो यही वो सज्जन हैं, जो आज सुबह से शाम तक उसके पीछे-पीछे युनिवर्सिटी में घूम रहे थे।

बेटी” - संबोधन सुनकर उसकी चेतना लौटी। आगन्तुक महिला ने अपने पर्स से सोने की चेन निकालते हुए उसे अपने पास बुलाया।

कविता ने माँ की ओर देखा- हाँ, हाँ बेटी ये लोग तुझे देखने आये हैं। तुझे पसन्द भी कर लिया है। यह तो सिर्फ रस्म अदायगी है।

लेकिन माँ, मैं तुमसे एक बात पूछना चाहती हूँ।

क्या बात है, बेटे?”

कविता के सवाल से सभी चौंक उठे। नरेन्द्र की आँखों के सामने कई-कई उठ खड़े हुए।

माँ, क्या पापा भी शादी से पहले तुम्हारे पीछे-पीछे घूमते फिरते थे? तुम्हारे खानदान में कभी ऐसा हुआ है क्या?”

आखिर बात क्या है बेटा? साफ-साफ कहो, पहेलियाँ मत बुझाओ?”

माँ! आपने अभी जिस लड़के को देखा वह दिन भर कालेज में मेरे पीछे-पीछे घूमता रहा है। जिस व्यक्ति को अपने माँ-बाप और बहन की आँखों पर विश्वास नहीं है वह विश्वास के लायक नहीं है। यह तो पूरी जिंदगी का सवाल है माँ।

कविता की बातों से सबके चेहरे पर खामोशी छा गयी थी। नरेन्द्र को लगा जैसे जीवन का जलतरंग बजते-बजते एकाएक रुक गया है।



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