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09.09.2007
 
संस्कार
कृष्णानन्द कृष्ण

प्रेम कुमार  ड्राईंग रूम में अकेले बैठे कमरे का निरीक्षण कर रहे थे। सारी चीजें करीने से सजाकर रखी हुई थी। शालिनी का यह गुण आज भी बरकरार है। वह एक-एक चीज को करीने से सजाकर रखती है। इन्हीं विचारों में डूबे वह शालिनी की प्रतीक्षा कर रहे थे। उनके भीतर विचारों का अंधड़ चल रहा था। वह तय नहीं कर पा रहे थे कि शालिनी का सामना कैसे करेंगे। बात की शुरूआत कैसे करेंगे? वह इसी उधेड़बुन में डूबे हुए थे कि तभी हाथ में ट्रे लिए हुए शालिनी ने कमरे में प्रवेश किया। डाइनिंग टेबुल पर सामने उनकी पसंद का नाश्ता और ब्लैक कॉफी का कप रखा हुआ था।

नाश्ता कीजिए ना,! कॅाफी ठंढी हो जायेगी” -मौन तोड़ते हुए शालिनी ने कहा।

शालिनी की आवाज सुनकर उनकी चेतना लौटी। सामने बैठी शालिनी की तरफ उन्होंने देखा। उस पर भी उम्र का असर होने लगा है, और इस स्थिति के लिए जिम्मेवार भी तो वह हैं। आखिर उन्हीं के चलते शालिनी को बच्चों के साथ घर छोड़ना पड़ा था।

उन्हें चुप देखकर शालिनी ने कहा- आप नाश्ता क्यों नहीं कर रहे हैं। पहले नाश्ता तो कर लीजिए ...........बातें बाद में होंगी।

प्लेट हाथ में उठाते हुए प्रेम कुमार ने शालिनी की ओर याचना भरी नजरों से देखा। उनकी आँखें छलछला आईं थीं। वे चाहकर भी आँसुओं को रोक नहीं पाए थे।

आपने अपनी हालत क्या बना रखी है? तबीयत ठीक नहीं रहती क्या?” प्रेम कुमार की हालत देखकर शालिनी का मन भींग उठा। आखिर वे उसके पति ही तो हैं। उनकी जगह कोई दूसरा तो नहीं ले सकता। तभी उसके स्वाभिमान ने जोर मारा। क्या उन्होंने पति की भूमिका का निर्वाह किया? तो फिर वह क्यों ऐसा सोच रही है।

 शालिनी!” -प्रेम कुमार की आवाज से उसका ध्यान टूटा।

आपने कुछ कहा क्या?”

 शालिनी, क्या हम फिर एक छत के नीचे नहीं रह सकते?”

प्रेम कुमार के इस अप्रत्याशित प्रस्ताव से वह असमंजस में पड़ गई थी। वह कुछ निर्णय नहीं कर पा रही थी। पहले के सारे दृश्य उसकी आँखों के सामने आकर खड़े हो गये थे। और उसका मन अतीत में खो गया था।

 शालिनी यह मेरा अनुरोध है ......मैं समझता हूँ तुम्हें टालना नहीं चाहिए।

नहीं पापा! बहुत देर हो चुकी है, अब ऐसा संभव नहीं है। जब हमलोग छोटे थे......हमें आपकी जरूरत थी, तब तो आपने हमें धक्के मार कर घर से निकाल दिया था। अब तो हमलोगों को अपनी तरह जीने दें। यह उनके बड़े बेटे की आवाज थी।

अनिल! यह क्या बदतमीजी है? ये तुम्हारे पिता हैं। शालिनी क्रोध से काँप रही थी।

मॉँ

नहीं अनिल ,नहीं ! तुम्हें बीच में बोलने की जरुरत नहीं है? ये पहले भी तुम्हारे पापा थे और आज भी हैं। चलो पैर छू कर प्रणाम करो । शालिनी ने अनिल को डाँटा।

प्रेम कुमार की आँखों से अश्रु की धारा बह रही थी।

 बेटे को आशीर्वाद भी नहीं देंगे क्या? चलिए! पहले फ्रेश हो लीजिए। फिर मैं कॉफी तैयार करती हूँ।” -कहती हुई शालिनी किचेन की तरफ चली गई।

वे चुपचाप शालिनी के भीतर बहती पुरानी नदी की चंचल धारा को महसूस कर रहे थे।



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