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09.09.2007
 
प्रेमचन्द की लघु रचनाएँ : लघुकथा की कसौटी पर
कृष्णानन्द कृष्ण

 

साहित्य में जब भी कोई विधा अपना आकार ग्रहण करने लगती है तब हम उसका संबन्ध अतीत से जोड़ने लगते हैं और उसमें उसके बीज तत्व की तलाश करने लगते हैं। आजतक अपनी विरासत को छोड़ कर न कोई आगे बढ़ पाया है और न आगे ब÷गा, क्योंकि विरासत की बनाई हुई गद्दी को आधार बनाकर ही हम नयी चीजों की तलाश करते हैं। मेरी समझ से किसी व्यक्ति या किसी विधा विशेष का एक दूसरे के साथ तुलनात्मक अध्ययन संभव नहीं है। क्योंकि हर विधा अपने आप में पूर्ण होती है उसका अपना अलग रंग-रूप, रस-गंध होता है और वही उसकी असली पहचान होती है। लघुकथा के विकास के साथ-साथ उसके विकास की जड़ों की खोज भी शुरू हो गयी है। और, लोग दूर की कौड़ी लाने के प्रयास में जुट गये हैं। यहाँ तक कि लोग लघुकथा की जड़ों की तलाश में वेदों उपनिषदों तक पहुँच गये हैं। किंतु वास्तविकता यह है कि लघुकथा आधुनिक युग की उपज है। कथा-सम्राट प्रेमचन्द की लघु आकारीय रचनाओं को लघुकथा की कसौटी पर कसने की यह कवायद भी शायद उसी आपाधापी का परिणाम है। क्योंकि प्रेमचन्द जिस काल में साहित्य रच रहे थे उस समय तक लघुकथा की परिकल्पना भी नहीं की गई थी। संभवत: पहली बारलघुकथा शब्द का प्रयोग बुद्धिनाथ झा कैरव ने साहित्य साधना की पृष्ठभूमि’ (पृ 0 257) पुस्तक में प्रकाशित अपने आलेख में किया था और इसे परिभाषित करने की कोशिश की थी। इसके बाद प्रो. जगदीश पाण्डेय ने श्री रामेश्वरनाथ तिवारी की लघुकथा पुस्तक रेल की पटरियाँ में इसकी शिल्प-प्रविधि के बारे में विस्तार से चर्चा की है। और, जब उस समय लघुकथा की अवधारणा ही नहीं थी तो उस काल की रचनाओं को आज की कसौटी पर कसना उनके साथ न्याय नहीं कहा जाएगा? इसका यह कतई अर्थ नहीं है कि हम अपनी परम्पराओं में अपना अक्स नहीं ढूँढें।

मेरे सामने विचार के लिए हिंदी-कथा-सम्राट प्रेमचन्द रचित चौदह लघु रचनाएँ, यथा- बाँसुरी’, ’बीमार बहन’, ’राष्ट्र का सेवक’, ’देवी’, ’बंद दरवाजा’,’दरवाजा’, ’बाबाजी का भोग’,’कश्मीरी सेव’,’दूसरी शादी’,’गमी’,गुरू-मंत्र’,’यह भी नशा, वह भी नशा’, ’शादी की वजह और ठाकुर का कुँआ मेरे सामने  हैं, जिन्हें आधुनिक लघुकथा की कसौटी पर रखकर परखना है और इन रचनाओं पर अपनी बेवाक टिप्पणी प्रस्तुत करनी है। आधुनिक लघुकथा पर विचार करते समय कम से कम उन तत्वों पर तो विचार करना जरूरी लगता है जो किसी लघु रचना को लघुकथा की संज्ञा दिलाते है। समकालीन लघुकथा पर विचार करते समय कम से कम निम्न शत्तों| पर ध्यान देना बहुत ही जरूरी लगता है:-

1. लघुकथा के कथानक का आधार जीवन के क्षण विशेष के कालखंड की घटना पर आधारित होना चाहिए।

2. लघुकथा का विकास तीव्र गति से उध्र्वगामी होना चाहिए ।

3. लघुकथा में विराम की स्थिति नहीं होती।

4. लघुकथा की भाषा प्रभावशाली और शिल्प सुगठित होना चाहिए।

5. लघुकथा में पात्रों के चरित्र का समुचित विकास ।

6. शीर्षक का महत्व।

कथा-सम्राट प्रेमचन्द की इन चौदह रचनाओं में मेरे दृष्टिकोण से 1 राष्ट्र का सेवक’, 2 ’देवी’, 3 दरवाजा’,4 बाबाजी का भोग’, 5 ’कश्मीरी सेव’, और 6 ’गमी लघुकथा के थोड़ा नजदीक लगती हैं।  मैं इन्हीं रचनाओं को अपने विचार के केंन्द्र में रखूँगा। क्योंकि अन्य रचनाएँ या तो पूर्णरूपेण कहानी हैं या निबंध के निकट की कोई रचना । इसलिए यहाँ उन्हीं रचनाओं पर विचार करना सही लगता है जो लघुकथा हैं या लघुकथा की कम से कम शर्तें पूरी करतीं हों। एक बात और बहुत मायने रखती है और वह यह कि रचनाओं पर विचार करते समय उसके रचनाकाल, सामाजिक और राजनैतिक परिवेश को भी ध्यान में रखना चाहिए, तभी उसके साथ न्याय करना संभव हो सकेगा।

प्रेमचन्द की रचनाओं पर विचार करते समय उनके लेखन के अंतर्विरोधों को समझना होगा तभी हम उसके साथ सही मूल्य का आकलन कर सकते हैं।  मेरी समझ से प्रेमचन्द के संपूर्ण लेखन में मुख्य रूप से तीन अंतर्विरोध उभर कर सामने आते हैं। प्रारंभिक दौर में उन्होंने राष्ट्रीय चेतना से ओत-प्रोत रचनाओं का सृजन किया तो दूसरे दौर की रचनाएँ गाँधीवादी दर्शन से पूरी तरह प्रभावित हैं और अंतिम दौर की रचनाओं में उनका झुकाव मार्क्सवादी जीवन-दर्शन और जनक्रांति के बीच उपर-नीचे होता रहता है। इसलिए पहले दौर की राष्ट्रीय चेतना से लैस रचनाओं को सोजेवतन संकलन में देखा जा सकता है। गाँधीवादी दर्शन से प्रभावित रचनाओं में मुख्य रूप से पंच परमेश्वर’ ’बड़े घर की बेटी’ ’ठाकुर का कुँआ जैसी रचनाओं को देखा जा सकता है। उनके अंतिम दौर की रचनाएँ आमआदमी के दुख:-दर्दों और उनकी बेहतरी की चिंता से जुड़ गयी थी, तभी वे अंतिम दौर में कफन’, ’पूस की रात’, और सवा सेर गेंहू जैसी कहानियाँ लिख रहे थे। यह बदलाव प्रखर रूप से उनके अंतिम उपन्यास मंगलसूत्र में साफ-साफ दिखाई देता है। इन्हीं अंतर्विरोधों के तहंत उनकी लघु-रचनाओं का मूल्याँकन करना समीचीन होगा।  राष्ट्र का सेवक का प्रकाशन काल सन्‌ 1930 ई. का है । यह वह समय था जब देश में आजादी के लिए जमीन तैयार हो रही थी। उस समय की सामाजिक, राजनैतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अगर इसका आकलन किया जाय तो यह रचना समकालीन लघुकथा की कसौटी पर पूरी तरह फिट उतरती है। यह शुद्ध रूप से व्यंग्य प्रधान लघुकथा है। संवाद के सहारे लिखी गयी इस रचना में नेताओं के दोगले चरित्र को बेनकाब करने का सफल प्रयास किया गया है। और रचना का प्रभाव पूरे वेग के साथ पाठकों के मन पर पड़ता है। राष्ट्र का सेवक का आरंभ इन आदर्श विचारों से होता है-"देश की मुक्ति का एक ही उपाय है और वह है नीचों के साथ भाईचारे का सलूक, पतितों के साथ बराबरी का बर्ताव। दुनिया में सभी भाई-भाई हैं, कोई नीचा नहीं, कोई ऊँचा नहीं।" किंतु जब नेता की बेटी उसी नीच से शादी करना चाहती है तो नेता जी का तेवर बदल जाता है। वे आग बबूले हो उठते हैं। उनके सारे आदर्श धराशायी हो जाते हैं। वे अपनी बेटी की ओर प्रलय की आँखों से देखते हैं। कथा-सम्राट प्रेमचन्द की प्रारंभिक रचनाओं में आदर्शवाद की काफी प्रचुरता मिलती है। इसलिए इनकी लघुरचनाएँ भी इससे अछूती नहीं रह पाती। देवी ऊपर से देखने पर एक आदर्शवादी रचना लगती है। किंतु इसके सूक्ष्म निरीक्षण से रचना की कई पर्त्तें खुलती हैं। अमीनुद्दौला पार्क के बाहर खड़े फकीर पर आने-जाने वालों की नजर का न पड़ना अस्वाभाविक नहीं लगता। आखिर लोग बेकार में किसी के लिए क्यों अपना समय बर्बाद करें। वहीं लेखक देवी की विधवा नायिका, जो खुद गरीब और लाचार है, का ध्यान उस फकीर की ओर खींचता है। अपनी आवश्यकताओं और जरूरतों में घिरी रहने के बावजूद उसकी सहानुभूति उस फकीर के साथ जुड़ती है और वह उठकर अपने हाथ में रखे दस के नोट को फकीर के हाथों में दे देती है। सरसरी निगाह से देखें तो यह रचना आदर्शवादी लगती है किंतु सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो यहाँ नायिका उस फकीर के पक्ष में खड़ी नजर आती है जो उसके करीबी वर्ग का है। और यही इस रचना की सफलता भी है।

बाबाजी का भोग और गमी दोनों रचनाएँ मूल रूप से व्यंग्य कथाएँ हैं। बाबाजी का भोग में दूसरों के श्रम पर पलनेवाले ढोंगी साधुओं और बाबाओं के चरित्र को पूरी तरह बेनकाब करने की एक सफल और इमानदार कोशिश की गई है। साथ ही धर्म-भीरू जनता के चरित्र पर भी कुठाराघात किया गया है जो अपने तो भूखे रहती है किंतु बाबाओं को तर माल खिलाकर अपने भूखे रहकर भी संतोष का अनुभव करते हैं। किंतु प्रेमचन्द जैसा महान कथाकार सिर्फ इतनी सी बात के लिए ही नहीं लिखेगा। कथा के अंदर आये प्रसंगों पर ध्यान दिया जाय तो यह कथा एक किसान के सर्वहारा में तब्दील होने की कथा है। उसी तरह गमी भी व्यंग्य रचना है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस कथा में व्यंग्य का केन्द्र बिंदु है अधिक संतानों का होना। लेखक बड़े ही रोचक ढंग से कथा बुनता है और आखिर में गमी के रहस्य को खोलता है। लोगों को यह रचना भले ही सामान्य लगे किंतु प्रेमचन्द जैसा लेखक सिर्फ अपने समय की रचना नहीं करता वह तो  आगे आनेवाले संकटों की ओर भी इशारा करता है। इस रचना में जनसंख्या विस्फोट और उसके कुपरिणामों की तरफ इशारा किया गया है। इन रचनाओं में आये फैलाव को अगर कम करके और कम्पैक्ट बनाया जाता तो रचना और निखर उठती। 

कथा-सम्राट प्रेमचन्द की एक और लघुरचना जो लघुकथा के निकष पर खरी उतरती नजर आती है वह है दरवाजा। इस कथा में बात सीधे न कह कर प्रतीक के माध्यम से कही गयी है। इस कथा में दरवाजा मध्यवर्ग के प्रतीक के रूप में व्यवहृत हुआ है । समाज में मध्यवर्ग की जो सामाजिक स्थिति होती है, घर में वही स्थिति दरवाजे की होती है। उसे हर हाल में लोगों की प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है। हालाँकि आखिर में जाते-जाते रचना एकदम दार्शनिक हो जाती है। "मैं एक कश्ती हूँ , फना (मृत्यु ) से वका (जीवन ) को ले जाने के लिए। कश्मीरी सेव जिसे हिंदी की प्रतिनिधि रचनाओं में शुमार किया जाता है कथ्य और काया के स्तर पर लघुकथा के निकट है। परन्तु इसके सूक्ष्म अवलोकन से इसमें आये अंतराल दोष का पता चलता है। जो उसे श्रेष्ठ लघुकथा बनने से रोकता है। वैसे अन्तर्वस्तु के स्तर पर इस रचना में महाजनी सभ्यता की विश्वसनीयता और अमानवीयता पर बड़े ही सधे ढंग से प्रहार किया गया है और यह बतलाने की कोशिश की गयी है कि कैसे महाजनी व्यवस्था असावधान रहने पर  आमलोगों को ठगती है। इस कथा के माध्यम से उन्होंने लोगों को सावधान भी किया है। इसके अलावे एक और लघु रचना दूसरी शादी में भी लघुकथा के बीजरूप कई स्तर पर मौजूद नजर ओते हैं किंतु आज के समय के लिए यह रचना कोई बहुत ज्यादा अर्थ नहीं रखती। बंद दरवाजा को शिल्प-शैली और आकार के हिसाब से बाल मनोविज्ञान पर आधारित अच्छी लघुकथा की श्रेणी में रखा जा सकता है। इस रचना में बच्चों के मनोविज्ञान का विवेचन बड़े ही सूक्ष्म ढंग से किया गया है। रचना की भाषा सुगठित और प्रभावशाली है।

इन रचनाओं के अलावा कथा सम्राट प्रेमचन्द की जो भी रचनाएँ हमारे सामने हैं उनमें लघुकथा के कोई भी लक्षण दिखाई नहीं देते हैं। जैसे ठाकुर का कुआँ उनकी प्रसिद्ध और प्रतिनिधि कहानी है। इसे लघुकथा की श्रेणी में रखना बड़ा ही हास्यास्पद प्रतीत होता है। इसको लघुकथा माननेवाले लोग प्रकारांतर से लघुकथा विधा को विवादों में उलझा कर फिर से भटकाव की स्थिति पैदा करना चाहते हैं। लघुकथा लेखकों को इन स्थितियों को नकारना होगा। "बाँसुरी" के बारे में रचना के नीचे संपादकीय फुटनोट में लिखा है कि यह अंश उनकी कहानी "तिरिया चरित्तर" के पाँचवें उपखंड का अंतिम पैरा मात्र है। तब एक प्रश्न जो मेरे मन में बार-बार उठता है कि इसे लघुकथा के रूप में पाठकों, सुधी विद्वानों के सामने परोस कर उस पर व्यर्थ का चर्चा कराना, कि यह लघुकथा है या नहीं, में समय बर्बाद करने से क्या फायदा? इन प्रवृत्तियों को देखकर प्रश्न उठता है कि क्या हर वह रचना जो काा में लघु हो वह लघुकथा है? तो हमें इसे निर्ममतापूर्वक नकारना होगा। चाहे वह रचना कितने भी बड़े रचनाकार की क्यों न हो। यह भी नशा: वह भी नशा में प्रेमचंद ने दो धम और दो संस्कृतियों की बुराईयों पर व्यंग्य करने की सफल कोशिश की है किंतु इसे लघुकथा कतई नहीं कहा जा सकता। "शादी की वजह" भी लघुकथा से इतर रचना है।

प्रेमचंद की पठित कुल चौदह रचनाओं में जिन रचनाओं में लघुकथा के तत्व मौजूद हैं और जिन्हें लघुकथा के निकट माना जा सकता है उनमें "राष्ट्र का सेवक", "देवी", "बंद दरवाजा", "दरवाजा", "बाबाजी का भोग", "कश्मीरी सेव" और "गमी" है। 



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