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09.09.2007
 
बिना छत के
कृष्णानन्द कृष्ण

माधवी को कोई काम करने की इच्छा नहीं हो रही थी। एक अजीब- सी उदासी उसके दिलो-दिमाग पर छाई हुई थी। चाह कर भी वह उसे दूर नहीं कर पा रही थी।  संध्या-समय कार्यालय से आने के बाद, सीधा अपने कमरे में आकर बिना कपड़े बदले, वह पलंग पर लेट गई थी। विगत कई दिनों से वह देख रही है, भैया-भाभी का रुख बदला-बदला सा लग रहा है। कोई खुलकर हँसता-बोलता तक नहीं। बस औपचारिकताएँ भर निभाई जाती हैं। माँ-बाबूजी भी कभी-कभार कुछ पूछ लेते हैं। सारे लोग चुपचाप अपना काम करते रहते हैं। ऐसे में उसका दम घुटने लगता है।

 बुआ! बुआ आज आप टॉफी नहीं देंगी ?” कहते हुए पप्पू पलंग पर चढ़ गया था।    

पप्पू को गोद में उठाते हुए माधवी ने कहा- पहले मीठी पप्पी दो।

पहले टॉफी” -कहते हुए पप्पू ने माधवी का बैग टटोलना शुरु कर दिया था।

 पप्पू ! ये गंदी आदत है। चलो, अपना होम वर्क करो?”-पप्पू की माँ ने डाँटते हुए उसका हाथ पकड़ कर खींचा। 

माधवी भाभी के इस अप्रत्याशित व्यवहार से भीतर तक हिल गई। उसके मन के भीतर बहुत सारे विचार गड़मड़ होने लगे थे। भैया-भाभी की मीठी बातें । माँ-बाबूजी का प्यार। जब कभी वह दस-पाँच दिन के लिए आती थी तो सब उसे तलहत्थी पर लिए फिरते थे। उसे याद है, जब वह पहली बार अखिलेन्द्र से अलग होकर आई थी, सबने ढाढ़स बँधाया था। भैया-भाभी ने कहा था- अरे माधवी! यह घर तुम्हारा है, तुम पराई थोड़े हो?” किन्तु आज अचानक यह बदलाव? वह कुछ समझ नहीं पा रही थी। वह तो किसी पर बोझ भी नहीं है। सरकारी नौकरी करती है। जरूरत पड़ने पर घर के कामों के लिए भी पैसे देती है, फिर यह बदलाव क्यों? वह इन्हीं विचारों के द्वन्द्व में फँसी हुयी थी, तभी भैया-भाभी की बातों से उसका ध्यान भंग हुआ।

 देखो जी, यह शरीफों का घर है। कोई होटल तो नहीं। ननद जी के साथ कैसे-कैसे लोग घर में आते-जाते रहते हैं। इससे घर के वातावरण पर बुरा असर पड़ रहा है। यह लता की आवाज थी।

क्या बकती हो? माधवी ऐसी नहीं है?” यह भैया की आवाज थी।

 गरजो मत, जाकर अपनी लाडली बहन से पूछो? परसों कौन आया था साथ में? घंटों हँसी-मजाक करके गया है। लता ने उँची आवाज में कहा।

अब तो बच्चों ने भी पूछना शुरु कर दिया है। मम्मी बुआ के साथ कौन अंकल आते हैं? उसे क्या जवाब दूँ? बोलो? चुप क्यों हो?”

उनकी बातों से उसका कलेजा छलनी हो रहा था। उसका मन विद्रेाह करना चाहता था, किन्तु वह भीतर से कमजोर होती जा रही थी। उसे लगा इस निर्मम समाज में बिना पति के जीवन व्यर्थ है। हर स्त्र को इस छत की आवश्यकता होती है। ऐसा सोचते ही उसे लगा जैसे उसके सामने से धुंधलका छँट गया है। आँसू पोंछते हुए उसने सामान पैक करना शुरु कर दिया था।



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