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| 09.09.2007 |
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कृष्णानन्द कृष्ण |
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सुबह-सुबह
काफी हलचल मची हुई थी। मुहल्ले के बड़े-बूढे,
नौजवान और बच्चों से पूरी गली अटी पड़ी थी। शोरगुल की हदतक लोग चीख-चिल्ला
रहे थे। मॉर्निंग-वाक से लौटते हुए राम प्रसाद बाबू ने जब यह नजारा देखा,
तो उनकी जिज्ञासा बढ़ी और स्थिति का जायजा लेने के लिए वहाँ रुक गये। उन्हें
रूकते देख कमलेश्वरी प्रसाद उनके नजदीक गए और कहा-
“भाई!
जमाने की हवा बहुत बिगड़ गई है। अब तो अपना खून भी दगा दे रहा है।”
“क्या
बात है भाई?”
कहते हुए राम प्रसाद बाबू भीड़ की ओर बढ़ गये। सामने का दृश्य देखकर वह भीतर
तक हिल गए। उनकी आँखों के सामने बहू की आकृति उभर आई। जो बात-बेबात उन्हें
झिड़कती रहती है। कल ही की तो बात है,
उन्हें पुआ खाने की तलब हुई। अपने पोते के माध्यम से उन्होंने अपनी बात
कहलवाई,
तो बहू ने दो टूक उत्तर दिया- “बूढ़े
हो गए किन्तु जीभ चटोरी नहीं गई। मेरे पास इतना समय नहीं है,
कि मैं दिन भर नौकरानी की तरह उनकी सेवा करती रहूँ।”
“क्यों
भाई! क्या सोच रहे हैं?
इस पर कुछ सोचना चाहिए,
नहीं तो पूरी सोसाइटी पर इसका असर पड़ेगा।”
कमलेश्वरी प्रसाद ने कहा।
“हाँ-हाँ
! आप ठीक कह रहे हैं। कुछ करना चाहिए।”
कहते हुए राम प्रसाद बाबू ने अपने को भीतर तक टटोला।
“अरे!
आप लोग देखते क्या हैं?
बुढ़िया का सामान उठाइये। देखता हूँ कैसे इसके बेटा-पतोह इसे निकाल देते
हैं।”
कहते हुए एक नौजवान ने बुढ़िया की बाँहों को पकडकर उठाया। पूरी भीड़ उसके
पीछे-पीछे चल पड़ी। न चाहते हुए भी राम प्रसाद बाबू भीड़ के साथ चल पड़े ।
उनके भीतर विचारों की उथल-पुथल मची हुयी थी।
बुढ़िया को खटिआ पर बिठाते हुए नौजवान चिल्लाया-
“अरे!
जोरू के गुलाम! जरा बाहर तो आ। देखूँ तुममें कितना दम-खम है। जिस माँ ने
तूझे पैदा किया,
पाला-पोसा वो आज इतनी पराई हो गयी।”
गली में भीड़ जमा हो गयी थी। कुछ लोग अपनी-अपनी बॉलकोनी में खड़े-खड़े तमाशा
देख रहे थे। राम प्रसाद बाबू भी भीड़ में खड़े थे। तभी उनकी नजर सामने
बॉलकोनी में खड़ी अपनी बहू पर पड़ी। एक अज्ञात भय की आशंका से उनका हृदय काँप
उठा। सर नीचे किए वे धीमी गति से अपने घर की ओर बढ़ गये। |
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