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09.09.2007
 
औकात
कृष्णानन्द कृष्ण

पद के मद में आकंठ डूबे श्याम सुंदर दास ने कभी किसी को तरजीह नहीं दी। एक ही लाठी से सबको हाँकते रहे। क्या घर, क्या बाहर, सब जगह एक ही व्यवहार। चाहे वो मातहत कर्मचारी हो या पदाधिकारी, दोस्त हो घर-परिवार का कोई सदस्य, किसी को भी रियाया से ज्यादा महत्त्व नहीं दिया। कोई सुझाव देता तो उसे डाँट देते और कहते- तुमको जब समझ में नहीं आता तो चुप रहा करो। जाओ, खाओे-पियो और मौज करो। यह सब मेरे प्रताप का फल है, भोगो। और हो-हो कर हँस देते। सारे-के-सारे लोग उनकी हाँ में हाँ मिलाते रहते थे।

एक बार उनकी सल्तनत को थोड़ा सा झटका लगा। उन्होंने अपने सिक्योरिटी ऑफिसर को पीकदान उठाने का इशारा किया। उसने उनकी बातों की ओर ध्यान नहीं दिया। वह चुपचाप अपने मातहतों को हिदायत देता रहा। उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच रहा था। तभी सामने बैठे पदाधिकारी ने आगे बढ़कर पीकदान थाम लिया।

ऐ मिस्टर! आपको कुछ सुनाता-वुनाता है कि नहीं? तू कइसे कम्पीट कर गया ?”-कहते हुए उन्होंने डाँटा।

मैंने कुछ समझा नहीं। उसने उत्तर दिया।

लगता है, तुमको यहाँ का कायदा-कानून समझाना पड़ेगा।

सामने खड़े उच्चाधिकारी ने उसे समझाना चाहा। उसकी लल्लो -चप्पो वाली बातों पर वह बिदक उठा। उसने संयत स्वर में कहा- माइंड योर ओन बिजनेस प्लीज।

ऐ सकसेरिया साहेब! अभी इसको यहाँ का बिजनेस रूल नहीं मालूम है। जब समझ जाएगा सब ठीक हो जायेगा। नया खून है नूँ। कहते हुए उन्होंने पान की पीक पच्च से उगल दी।

ऐ मिस्टर! जरा थरमस इधर बढ़ाइये तो।

उनकी बातों पर ध्यान न देते हुए वह चुपचाप खड़ा रहा। गुस्से में तमक कर वे बोले- अरे आप ही से कह रहा हूँ। आप बहरे-वहरे तो नहीं नूँ हैं?”

इसबार सिक्योरिटी ऑफिसर के चेहरे का रंग बदला। उसने थोड़ी तल्ख आवाज में कहा- मैं आपका सिक्योरिटी ऑफिसर हूँ ... चपरासी नहीं। मैं अपनी ड्यूटी कर रहा हूँ।

लगता है आप हमें जानते नहीं हैं” -कहते हुए उनका चेहरा तमतमा उठा।

जानता हूँ! अच्छी तरह पहचानता हूँ। क्योंकि मैं आपका सिक्योरिटी ऑफिसर हूँ। उसने कहा।

उसकी दृढ़ इच्छाशक्ति के सामने वे निरुत्तर थे। चुपचाप उठकर भीतर कमरे में चले गए।



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