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03.26.2014


मिला ना तोड़

खिंची लकीरें चिंता की मुख
खोज ना मिला निदान
आँख शुष्क सपने सब रीते
पतझड़ सी वीरान
युग बीते जन व्यस्त खोजते
पीड़ाओं का तोड़
हर कोशिश नाकाम पकड़ने
में जीवन का छोर
कौन अधूरी कथा कहानी
जिनके रेशे उलझे
समझ ना पाए सिरे कहाँ से
पकड़ें उलझन सुलझे
इक पकड़ें छुटे दूजी बाँकी
ताने-बाने की डोर
सतत प्रयत्न कर योद्धा हारे
डूबे कई गोताखोर
लाख जतन कर रहे छानते
राह गली हर मोड़
खोज-खोज हारा जग युक्ति
थकी ना मन की होड़।


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