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04.16.2014


वारेन हेस्टिंग्स का डाकिया

भारतीय डाक और भारतीय प्रेम!–एक अफ़साना

बात पुरानी है, पुराने लखनऊ की। एक थे राघव दादा, कलेक्टर बनाने की उम्मीद से पढ़ने आये थे लखनऊ, तैयारी कर रहे थे, इसी मध्य उन्हें एक लड़की से इश्क हो गया और कुछ अरसे में इश्क का अंत भी। जीवन अनवरत ज़ारी था अपनी रफ़्तार में, तभी एक घटना ने राघव दादा के मुर्दा प्रेम को ज़िंदा करने की सनक पैदा कर दी।

दरअसल एक विक्कू नाम का लड़का भी तैयारी कर रहा था सिविल सर्विसेज़ की। थोड़ा हरफन मौला टाइप का मिजाज था उसका.. ज़िंदगी से बड़ी आसानी से दो-चार कर लेने के फन में माहिर! पर दादा ठहरे गहराई पसंद, सो मामला पेंचीदा हो गया। विक्कू का कोई चलताऊ नवयुग का प्रेम अफेयर था, मामला डिस्कनेक्ट हो चुका था, सो उस युवती को मोबाइल नंबर पहुँचाने की जुगत में लगे थे विक्कू बाबू। …बात राघव दादा तक पहुँची, …बगल वाले कमरे में तो रहते थे वे। …बड़े व्यवहारिक, ...उधार ले लेते अपनों से जूनियरस को खिलाने-पिलाने के लिए। …बड़ी शिद्दत और ज़िम्मेदारी से बड़े होने का पालन करते। विक्कू के नवयुग प्रेम से अनिभिज्ञ दादा ने विक्कू से कहा कि मैं तुम्हे एक प्रेमपत्र लिख दूँगा जिसमें शब्द शब्द दर्शन से सने हुए होंगे। पढ़ते ही वह बालिका तुम्हारे प्रेम के कमरे में दोबारा प्रवेश ले लेगा। ….होशियार विक्कू यही तो चाहता था कि अपनी हैण्ड राईटिंग में न लिखना पड़े पत्र। ...कहीं वह नव विचार युक्त भूमंडलीकृत विचारों से सुशोभित कन्या विक्कू के हस्तलिखित प्रेमपत्र का गलत इस्तेमाल न कर दे। ….. अंतत: विक्कू के लिए पत्र दादा ने लिखा और बड़प्पन दिखाते हुए कंधे पर हाथ रख कर बोले दे आ, समझो वह बालिका फिर से तेरी हुई! …..विक्कू दौड़ता हुआ उस कन्या के कार्यक्षेत्र में पहुँचा जहाँ आगुन्तकों के स्वागत हेतु बैठी बालिका को पत्र थमा का वांछित कन्या को दे देने के लिए कह कर सरपट वापस आ गया। विक्कू अपने कमरे पर पहुँचा ही था… कि नवयुग की कन्या का फोन विक्कू के पास आ गया। … दादा भी प्रभाव देखना चाहते थे अपने लेखन के चातुर्य का, ……दादा बोले किसका है? बिक्कू ने इशारा किया ..उसी का। …दादा बहुत ही प्रसन्न हुए ….किन्तु इस प्रसन्नता ने उन्हें उनके अतीत में धकेल दिया …जहाँ सिर्फ अन्धेरा था और था मुर्दा प्रेम…..।

दादा ने उसी वक्त ठान लिया की क्यों न वह अपने शब्द मन्त्रों से ख़तों की आहुति दें अपने मुर्दा प्रेम पर। …वह जाग उठेगा किसी रामसे ब्रदर्स की डरावनी फिल्मों के भूतों की तरह! …..राघव दादा ने अब ख़त लिखना शुरू कर दिया अपनी प्रेयसी को! ….जवाब नहीं आये तो रजिस्टर्ड डाक का इस्तेमाल किया। …ख़त ही वापस आने लगे उनके पास, …तो खीझ कर उन्होंने अपनी प्रेमिका के पड़ोसियों को केयर ऑफ़ बनाकर पत्र भेजने शुरू किए। ..दो महीने गुज़र गए इस ख़तबाज़ी में। …दादा के पत्र अभी भी निरुत्तर ही थे … किन्तु एक फ़र्क आया था उस मोहल्ले में जहाँ दादा की प्रेमिका रहती थी। ..अब मोहल्ले वाले डाकिए को देखकर अपने दरवाज़े बंद कर लेते या राह में डाकिया मिल जाता तो नज़र बचाकर भागने लगे। …यह असर ज़रूर पडा था दादा के ख़तों का …शब्दों का प्रभाव अभी बाकी था? क्योंकि पत्र पढ़े नहीं गए थे वे तो वापस हो आते थे! ….दादा का पत्र लेखन ज़ारी था। अब तो वह शहर की सीमाएँ लाँघ कर प्रेमिका के रिश्तदारों को ख़त भेजने लगे थे! …किन्तु जवाब न आने से वह थोड़ा विचलित थे। …आखिरकार पाँच महीने गुज़र गए। सब्र का बांध ढह गया। दादा अपनी प्रेयसी के मोहल्ले पहुँच गए। …कुछ मलिक्ष मन्त्रों अर्थात गालियों का आह्वान किया। ..मोहल्ले में लोग-बाग अपनी अपनी छतों पर सवार पूर्व विदित मामले का जायज़ा ले रहे थे। …तभी धड़ाम की आवाज़ आई …और लोग चिल्ला उठे बम…..बम ……!!!!

****************दूसरी क़िस्त********************

(दादा अब लखनऊ से बरेली आ चुके थे …बरेली जेल) …….दरअसल उन्होंने उस रोज़ अपनी प्रेमिका के घर पर बम फेंका था। …कोई हताहत तो नहीं हुआ बस दीवार टूट गयी थी और कुछ लोगों को चोंटे आई थीं। ….इसी कृत्य के बदले उन्हें यह सरकारी इमदाद मिली कि कुछ दिनों तक सरकारी घर और सरकारी भोजन। ….दादा अभी भी हार नहीं माने थे …पत्र लेखन जेल से भी ज़ारी था! इसी बीच उनके सह्बोले सूत्रों ने जेल में ख़बर पहुँचाई की भौजी की तो शादी हो गयी!

…राघव दादा उस रोज़ बहुत रोये ….निराशा ने उनके जीवन के इस परम उद्देश्य को बंदी बना लिया …पर बड़ी जीवटता वाले शख़्स थे। फिर कलम उठाई और शुरू कर दिया अपनी प्रेमिका की ससुराल में पत्र भेजना। …ये सारी ख़बरें विक्कू जैसे उनके तमाम मित्रवत छोटे भाई समय समय पर जेल में पहुँचाते रहते। …..पर अबकी बार ख़त वापस नहीं आये यानी वो पढ़े गये। …चिट्ठी का असर तो आप सभी लोग देख ही चुके थे। पूरा मुहल्ला आतंकित था डाकिए की सूरत देखकर। …अब राघव दादा के शब्दों की कारस्तानी बाकी थी वो भी पूरी होने वाली थी अब!

 ….एक रोज़ जेल में एक अपरिचित राघव दादा से मिलने की दरयाफ्त लेकर आया। …दादा उससे मिले। …पता चला वो उनकी प्रेमिका का पति है। उसने ख़त पढ़े थे सो उन्हीं शब्दों के असर से बावस्ता होकर वह भागा चला आया था राघव दादा के पास। …अब रूबरू होकर दादा के वाक के चातुर्य से दो चार होने वाला था वो। …दादा ने उसे अपने प्रेम-प्रसंग की तमाम बारीकियों से परिचित कराया उसे, तमाम दलीलें दीं और सबूतों के मौजूद होने की बात कही! वह व्यक्ति अवाक सा था! उसके ज़हन में सुनामी चढ़ रही थी और पैर धरती का सहारा लेने में अक्षम से हो रहे थे ऐसा था दादा का दलीलनाम! …दरअसल दादा ने वकालत की भी पढाई की थी। सो प्रेम की वकालत करने में भी वकील होने का पुट पर्याप्त था। ….यहाँ एक बात बता देना ज़रूरी है कि दादा से उनकी प्रेमिका ने कभी संसर्ग के पश्चात कहा था कि तुम्हीं मेरे पति हो, मेरी माँग भर दो मैं जीवन भर तुम्हारी ही रहूँगी! बस क्या था दादा ने फ़िल्मी अंदाज़ में भावनाओं से सरोबार अपने रक्त की कुछ बूँदों से उसकी माँग भरी थी ….और यही बात उनके मन में पैबस्त हो गयी थी कि उसने कहा था कि मैं तुम्हारी हूँ और जीवन भर तुम्हारी रहूँगी! …इस प्रसंग पर दादा अपने सह्बोलों से अक्सर कहते क्यों कहा था? उसने ऐसा फिर क्यों नहीं पूरा किया अपना वादा! …जो मेरे जीवन का उद्देश्य बन चुका था!

……… खैर कहानी ने यहाँ बड़ा मार्मिक मोड़ लिया। दादा की प्रेयसी के पति ने उसे तलाक दे दिया……दादा के प्राइवेट सूत्रों ने ये ख़ुशख़बरी दादा को पहुँचायी। …एक बार फिर उस मोहल्ले में डाकिए की आमद बढ़ गयी और लोग-बाग दोबारा विचलित होने लगे! दादा ने फिर अपनी प्रेयसी के घर पत्र लिखना शुरू कर दिया था क्योंकि उन्हें पता चल चुका था कि उनकी प्रेमिका को उसके पति ने छोड़ दिया है! ….किन्तु वह मुर्दा प्रेम इतनी कवायदों पर भी जागृत नहीं हो पा रहा था।

…..दादा को ज़मानत मिली। वह लखनऊ छोड़ अपने घर जिला शाहपुर वापस आ गए और खेती करने लगे साथ ही वहीं के डिस्ट्रिक्ट की सिविल कोर्ट में वकालत भी! राघव दादा अब टूट चुके थे। …अपने पुराने प्रेम को शब्दों की अभिव्यक्ति से ख़त के माध्यम से जिलाने में। ……जीवन के कई बरस की तहोबाला कर दी थी उन्होंने इस ख़्वाब के लिए कि शायद उनकी प्रेयसी दौड़कर उन्हें गले लगा लेगी और सीने में धधकती ज्वालामुखी ठंडी हो जायेगी उस प्रेम की बारिश से! …पर ऐसा नहीं हुआ। …अक्सर होता भी नहीं है। यथार्थ में …टूटे हुए रिश्ते और टूटे हुए धागे रहीम की तरह बहुत मानते हैं ..चटक जाए तो जुड़ते नहीं जुड़ जाए तो गाँठ ………! दादा ने अपने प्रेम को खो दिया था और शायद हार भी मान चुके थे। …परन्तु विक्कू के सतही प्रेम की रवादारी देख उनकी गहरी आँखों में अपने प्रेम को जगा लेने की तमन्ना पैदा हो गयी। …सर्वविदित है कि गहराई में जाने पर डूबने की आशंका अत्यधिक बढ़ जाती है बजाए सतह पर रहने से। …विक्कू आज भी तैर रहा है रंग बिरंगी स्वीमिंग ड्रेस में कभी कभी हलके फुल्के गोते भी लगा लेता है किन्तु गहराई में नहीं जाता कभी!

*************************तीसरी क़िस्त ***************************

…जिला शाहपुर …राघव दादा के नाम से बहुत जल्दी वाकिफ हो चुका था चंद महीनों में। ….उनकी यह शोहरत वकालत के लिए नहीं थी और न ही उनकी वह मुर्दा मोहब्बत थी इसकी वज़ह! वे लोगों में, मुख्यतः उस जनपद के सरकारी तंत्र में कुख्यात हो चुके थे। …वज़ह थी उनकी पत्र लिखने की आदत जो अभी भी बरकरार थी उनमें, बावजूद इसके कि वह अपनी मोहब्बत में पत्राचार करके फेल हो चुके थे। …..दरअसल ये सब कमाल था वारेन हेस्टिंग्स की डाक का, जी हाँ यही शख़्स तो था जिसने ईस्ट इंडिया कम्पनी के गवर्नर जनरल का रूतबा मिलने के बाद अपने शासन में डाक सुविधा आम जनता को मुहैया कराई और एक डाक की फीस एक आना प्रति १०० मील। ….यही डाक ने तो राघव दादा को कई रंग दिखाए थे। …जिसमें लाल रंग की छटा ज़्यादा प्रभाई थी। …भारतीय डाक का डाकिया राघव दादा की वज़ह से उदय प्रकाश के वारेन हेस्टिंग्स का सांड बन चुका था कहीं उससे भी ज़्यादा भयावह ……..!

राघव दादा अब भारतीय डाक के उस इम्पेरियल लाल रंग वाले बक्से का पूरा इस्तेमाल अपने गृह जनपद में कर रहे थे, …एक लेखपाल की नौकरी ले चुके थे ।अभी तक ख़तों के माध्यम से और अब एक डिप्टी कलेक्टर के पीछे पड़े हुए थे। …ख़तों का सिलसिला मुसलसल ज़ारी था और ख़तों की मंज़िल होती थी दस जनपथ और रायसीना हिल। ………राघव दादा प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से नीचे के ओहदे वालों को अमूनन ख़त नहीं लिखते थे यह विशेषता थी उनकी! ….शनै: शनै: शाहपुर कचहरी में जब दादा की आमद होती तो वहाँ के सरकारी अफसर और कर्मचारी राघव दादा को देखकर कन्नी काटने लगते। ……ये सब कमाल था दादा के वारेन हेस्टिंग्स की डाक का! ….इश्क़ से हाथ धो बैठे थे पर भारतीय डाक का इस्तेमाल करने की आदत अभी भी मौजूं थी और शायद और पैनी हो चुकी थी। अब तलक की समयावधि में ……..कभी भारत जैसे देश में हरकारे एक जगह से सरकारी डाक दूसरी जगह पहुँचाते थे या व्यक्तिगत सूचनाएँ लोग-बाग एक दूसरे के रिश्तेदारों के माध्यम से। …कभी कबूतर भी था जो प्रेम संदेशों की अदला-बदली कर दिया करता था। …लेकिन ये सारे माध्यम ख़ुद सुनसान राहों जंगलों और डाकुओं से डरते थे। ….पर वारेन हेस्टिंग्स का डाकिया जब अवतरित होता राघव की डाक लेकर तो बड़े-बड़ों की घिग्गियाँ बंध जातीं……..!

भारतीय डाक पारस के बादशाहों से लेकर सुल्तानों की सुल्तानी तक के सफ़र के बाद द ग्रेट ईस्ट इंडिया की इंतज़ामियाँ में ख़ास से आम हुई। … ब्रिटिश भारत में स्वतंत्रता आन्दोलन की रीढ़ बनी भारतीय डाक …कहते हैं कि १९४२ के दौर में बापू जब क्रान्ति कर रहे थे तो ब्रिटिश भारतीय डाक द्वारा किसी भी चिट्ठी पर सिर्फ गांधी, बापू या महात्मा लिखा होने भर से वह डाक बापू तक पहुँच जाती थी। वह चाहे जहाँ हो पूरे भारत वर्ष में। …..ऐसा ही कुछ क्रांतिकारी प्रभाव था राघव दादा में कि डाकिया उनकी प्रेमिका के मोहल्ले में पहुँचा नहीं के लोग जान जाते थे कि उन्हीं का ख़त आया होगा। …….ख्याति तो थी बापू विख्यात थे भारत वर्ष में तो चिट्ठी पहुँच जाती थी वो कहीं भी हों बिना पते के। …और दादा कुख्यात थे चिट्ठी पहुँचने से पहले ही डाकिए की सूरत से लोग भाँप जाया करते थे, कि आ गयी……..!! आज कुछ ऐसा ही शाहपुर के सरकारी तंत्र के लोगों में भय व्याप्त रहता है। …अर्दलियों के चिट्ठी देने से पहले अफसर पूछते की राघव से सम्बंधित तो कोइ पत्र नहीं है? और अर्दली डाकियों से पूछते उसका तो नहीं है कुछ? …..

बात इस्तेमाल की है भारतीय डाक ने कई इतिहास रचे। ..हर बुरी परिस्थितियों में उस व्यवस्था ने जनमानस का साथ दिया …और आज भी डाकिए मुस्तैद हैं अपने काम पर सूचनाओं से लैस। …इलेक्ट्रानिक संदेशों की व्यवस्था ठप हो जाने पर यह इंसानी मशीनरी हर वक्त काम करती है हर आपदा में। …..पत्रों की एक और ख़ासियत है कि इनकी सनद ज़्यादा पुख़्ता रहती है। …किसी और सूचना के माध्यम के बजाए …और इनका प्रभाव भी ……!
इतिहास सिखाता है दादा ने भी सीखा होगा ….कि हर वह व्यक्ति जो जितना अधिक चिट्ठीबाज़ था वह उतना ही अधिक महान हुआ। ….मोहनदास, नेहरू, टैगोर आदि-आदि …..पत्रों की रूमानियत और उनकी ख़ासियत तो कोई दिल वाला ही जान सकता है। …दादा ने भी जाना आख़िर जो वो दिलदार ठहरे। ..पर इस्तेमाल का तरीका ज़रा तिरछा हो गया …! नतीजतन कहानी मोड़ नहीं ले पायी! ….पर दादा अब भ्रष्टाचार को चुनौती दे रहे हैं, भारतीय डाक के माध्यम से …उनके जज़्बे को सलाम ….की ज़िन्दगी अब मुसलसल एक रफ़्तार और सीधी राह पर रफ़्ता रफ़्ता चल रही है …अब गाफ़िल नहीं है वह!

..राघव दादा की प्रेयसी काश ..खुद डाकिये से यह कह देती की "ख़त लिख दे सांवरिया के नाम बाबू …वो जान जायेगें ..पहचान जायेंगे" तो ये डाकिये की डाक वारेन हेस्टिंग्स के सांड की तरह न होती वहाँ के लोगों में।….पर अफ़सानों का क्या वे किसी पर रहम थोड़े करते हैं बस बयान कर देते है जस का तस!

……यकीन मानिए ये वारेन हेस्टिंग्स की डाक लाने वाले डाकिए की सूरत को देखकर राघव दादा की प्रेयसी के उस मोहल्ले के लोग अब भी मुस्करा दिया करते होगे ………..इति


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