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04.16.2014

 
परिचय  
   Krishna Kumar Mishra
नाम :

कृष्ण कुमार मिश्र

जन्म : ११-०८-१९७७ को बृहस्पतिवार की दोपहर को इस दुनियां में आंखे खोली अपने जनपद मुख्यालय के सरकारी अस्पताल में
शिक्षा :

स्कूली शिक्षा मैनहन की प्राथमिक पाठशाला में, फिर मितौली के राजा लोने सिंह उच्चतर माध्यमिक विद्यालय से कक्षा आठ उर्त्तीण किया तदपश्चात मेरा दाखिला लखीमपुर शहर के धर्म सभा इण्टर कालेज में कराया गया, विज्ञान स्नातक की शिक्षा युवराज दत्त महाविद्यालय लखीमपुर से फिर एशिया के विशालतम महाविद्यालय दयानन्द एंग्लो वैदिक कालेज से जन्तुविज्ञान में परास्नातक की शिक्षा प्राप्त की विद्यालय में प्रथम श्रेणी का दर्ज़ा हासिल किया, और यही से शुरूवात हुई प्रकृति के अध्ययन करने की उत्कठां की और पीएच.डी. में दाखिला लेकर मैं चल पड़ा अपने दुधवा जंगल की तरफ़ यात्रा जारी है पर यह कभी खत्म नही होगी प्रकृति के अथाह ज्ञान भण्डार से जितना कुछ मालूम होता जा रहा है उतनी ही आंनद की अनुभूति बढ़ती जा रही है.शायद चर्मोंउत्कर्ष की स्थित प्राप्त हो जाये और मैं बुद्ध हो जाऊ यही अभिलाषा है।

व्यवसाय : वन्यजीव विज्ञानी और एक प्रकृति फोटोग्राफर
प्रकाशन : अखबारों, पत्रिकाओं, और वैज्ञानिक जरनल्स में लेखन कार्य
लेखन प्रेरणा : बचपन में मां ने रामायण, महाभारत की कहानियों से मेरे भीतर आदर्शता व भारतीयता के संस्कार भरे, आल्हा की कहानियों और परी कथाओं से मुझ में साहस और कल्पना शक्ति का विकास किया, कक्षा ९ में मैं अपनी मां के सौजन्य से लखीमपुर के विलोबी मेमोरिअल हाल पुस्तकालय का सदस्य बना और वहाँ मैं परिचित हुआ इस रंग भरी दुनियां से, गांधी, लेनिन, जोसेफ़ स्टालिन, चर्चिल, गोर्की, दोस्तोविस्की, जयशंकर प्रसाद, बकीमंचन्द, शरतचन्द और मुसोलिनी से परिचित हुआ।
मेरे बाबा की उर्दू तालीम ने मुझे प्रभावित किया तो मैने उर्दू पर भी अधिकार हासिल किया, संस्कृत और ज्योतिष की शिक्षा में मेरे नाना प्रेरणा स्रोत बने।
मेरे व्यक्तित्व में सर्वागीण विकास की देन मेरे पिता की है जिन्होने मुझे प्रोत्साहित किया हर मौके पर और उनके बेहतरीन व्यक्तित्व की छाप मुझ स्पष्ट झलकती है। उनकी सरलता, बच्चों के प्रति प्रेम और समाज के प्रति सौहार्द और शिक्षा के विकास पर उनका संघर्ष, उनकी हर आदत ने मुझ पर एक अमिट छाप छोड़ी है जो अब संस्कार बन चुके हैं। और ये लक्षण मुझ में परिलक्षित होते हैं हमेशा जो लोगों को मेरे पिता की याद दिलाते हैं।
जीवन दर्शन : कुल मिलाकर मैं प्रतिकृति हुँ अपने माता-पिता, बाबा-दादी, नाना-नानी की किन्तु ये तो उनसे हमारा सीधा आंनुवशिक रिस्ता है इसके अलावा मुझे लगता है कि मुझ में उन सब का समावेश है जो इस धरती या ब्रह्माण्ड में मौजूद है, और मैं हर वक़्त उन सब ची्ज़ों का अंश होने का एहसास करता हूँ।
मुझे ये नही पता मुझे क्या बनना है पर ये मालूम है कि मुझे बेहतर करना अतीत में अपने बुजर्गों की तरह, एक सुन्दर कहानी की रचना, सब लोगों के साथ मिलकर जो धरातल पर हो .यथार्थ!
क्योंकि मैं बचपन से आज तक रोमांचित होता आया हूं उन कहानियों को सुनकर, उन बेहतरीन लोगों की बेहतरीन संघर्ष गाथायें।
धरती पर मौजूद अपने सहजीवियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ रहा हूँ इस आशा के साथ की कभी तो लोग तहे दिल से इस अभियान में शामिल होगें, ..
संसार के तमाम ऋणों में जैसे मातृ ऋण, पितृ ऋण, गुरू ऋण की थोड़ी बहुत भरपाई करने की अथक कोशिश तो करता रहता हूँ किन्त मुझे मेरे कन्धों पर सदैव प्रकृति के सभी अंशों का ऋण महसूस होता है उनका कर्ज़ कैसे उतार पाऊँ बस यही जुगत करनी है जीवन भर।
फ़ोटोग्राफ़ी मेरा शौक है और मैं हर वक्त वर्तमान को कैमरे में कैद करने की कोशिश में जुटा रहता हूं इससे पहले की वह इतिहास हो जाये, और बिना प्रमाण की कहानियों में तब्दील!
संप्रति : अध्यापन के साथ-साथ, किसान परिवार से ताल्लुक होने के कारण अपनी जमीन में खेती जैसा सुन्दर रचनात्मक कार्य भी
अभिरुचियाँ : पुस्तकें, मूर्तिकला, ऐतिहासिक स्थल और लोग
सम्पर्क : krishna.manhan@gmail.com