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चरित्र ! तेरे पतन में
सिर्फ आधुनिक हवा का ही दोष नहीं
बल्कि,
वैचारिक अनैतिकता, अपरिपक्व व्यावहारिकता
दोहरी मानसिकता, सामाजिक लोलुपता
और भविष्य की अनिश्चितता जैसे
रोग भी उसमे शामिल हैं
जिन्होंने साफ-सुथरे बदन को
और दागदार किया है !
और ऊपर से-
सच्चों मे जान-माल का डर
समाज में गुंडे-मवाली की पकड़
लालफीताशाहों में फैली वेश्यावृत्ति
पुलिस की निकम्मी प्रवृत्ति
न्यायपालिका के बँधे हाथ
राजनीतिज्ञों की ढुलमुल बात-
ये सब काजल की कोठरी है
जिससे कोई आम आदमी
दामन बचाकर
निकल ही नहीं सकता !
और यह भी सच है कि
पैसों से चरित्र पर लगे दाग मिटाए जा सकते हैं,
ज़िंदगी बेची और मौत खरीदी जा सकती है,
दागी व्यक्ति किसी भी ऊँचे ओहदे पर बैठ सकता है
और गुनाहगार जेल में सारी सुख-सुविधाएँ प्राप्त कर सकता है !
तो
क्या औचित्य है चारित्रिक छवि का ?
जो अतीत की तरह
किताब के साधारण पन्नों पर
छोटे-छोटे अक्षरों में
हाशिए में लिखी मिलेगी !
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