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02.08.2008
 

यन्त्रवत्
कृष्ण बजगाईं


 आधुनिक शहर के एक कोने में लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। भीड़ के लोग आश्चर्यचकित होते हुए बड़े मजे से वहाँ के दृश्य का मजा ले रहे थे। वहाँ भीड़ जम गई थी। एक यन्त्रमानव के कारण। बिल्कुल मानव की तरह का वह मानव के पूरे हाव-भाव की नल करता था। समय-समय पर विचित्र आवाज़ निकालकर आदमियों को बुलाता था। भीड़ के आदमी उसको विज्ञान का उच्चतम विष्कार समझकर आश्चर्यचकित होकर देख रहे थे।

भीड़ के सभी आदमी उस यन्त्रमानव को बहुत करीब से देख रहे थे। कोई उससे बड़े आराम से हाथ मिला रहा था। कोई अचम्भित होकर उसको छू रहा था। कोई उसके साथ बैठकर फोटो ले रहा था। भीड़ के कुछ बुज़ुर्ग भगवान का आधुनिक अवतार मानकर उस यन्त्रमानव के चरण स्पर्श कर रहे थे।

भीड़ में काफी आदमी हो चुके थे। अचानक यन्त्रमानव ने मानव आवाज निकाली - "खाने के लिए दो-चार पैसा दे दीजिए हुज़ूर।" यन्त्रमानव ने भीड़ के सामने हाथ फैलाया। इस दृश्य को देखकर भीड़ के आदमी आश्चर्यचकित हो गए।

"कैसे यन्त्रमानव आदमी की तरह बोल सकता है? पैसा यन्त्रमानव के क्या काम आएगा …… ।" भीड़ के आदमी प्रश्न-प्रतिप्रश्न करने लगे। तब यन्त्रमानव  मीठी आवाज में बोला-"आधुनिक ज़माने के इस आधुनिक शहर में सिर्फ मैंने भीख माँगने के तरीके में परिवर्तन किया है। वास्तव में मैं आप लोगों की तरह का वास्तविक आदमी हूँ।" उसकी इस तरह की बात सुनकर भीड़ के सभी आदमी यन्त्रवत् हो गए ।


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