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06.14.2014


तुम और मैं

तुम उत्तंग शिखर धरा पर, मैं शीतल एक अविरत धारा
तुम दुर्गम हो मार्ग, पथिक प्यासे का हूँ मैं एक सहारा

तुम हो विकसित पूर्ण सुगंधित, रंग बिरंगी पुष्प वाटिका
मैं मुरझाया पुष्प समर्पित, चरणों पर जीवन एक सारा

तुम मृगनयनी के नयन सुशोभित, चंचल चितवन
मैं उस चंचल चितवन में संचित आँसू एक खारा

तुम अंबर अति शुभ्र, असीम चँदा सूरज अपने में समाये
मैं अविचल चिरदिन चमकता, उत्तर में ध्रुव का एक तारा

तुम सुमधुर संगीत ध्वनि आलाप से करते जग सम्मोहित
मैं अकिंचन राग भजन का, गाऊँ ले जीवन एकतारा

तुम समर्थ रणवीर जीतते हर बाज़ी अपने ही दम पर
मैं आश्वासन उस योद्धा का, जीवनजंग हरएक जो हारा॥


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