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05.01.2014


मैं नहीं कोई सुखनवर

मैं नहीं कोई सुखनवर यह तो बस उसका फ़ज़ल है
ख़याल ऊतरे जो सफ़ों पर, बन गई देखो ग़ज़ल है।

जो लिखा दिलकी क़लम से, जज़्बातों की रोशनाई
बयाँ किये दिल के तर्जुबे,बन गई देखो ग़ज़ल है।

कह न पाये राज़ दिलके,ना किये इज़हार जो
आज सजा कर दिये वो, बन गई देखो ग़ज़ल है।

क़ाफ़िये मिलते रहे, कुछ तो बहर में बात आई
हो गया मिसरा मुकम्मल, बन गई देखो ग़ज़ल है।

आज मलता बन गया, कल मक्ताए सानी बनेगा
"कान्त" करते अर्ज़ तब, बन गई देखो ग़ज़ल है।।


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