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ISSN 2292-9754

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06.17.2016


समझौता

विस्मरण की स्थितियाँ
पहल कभी रही होंगी
बचपन में, या
बचपने के बाद भी,
तब शायद मैं
काल निर्मित रहा हूँगा।
अब लेकिन धुरियाँ बदल गई हैं
समय को मैं बनाने लगा हूँ।

तुम्हारी विडम्बना बस यही थी
कि, अपनी महत्ता को,
जो जैसा कभी नहीं रहा –
उस अस्तित्व को
बनाये रखने के मोह में
शिल्पी बनकर –
नया रास्ता बनाने में जुट गये।
मैंने भरसक प्रयत्न किया दोस्त
कि तुम समानांतर राह बनाना छोड़ दो।
फिर भी
तुम नहीं माने
और मेरा हर उपक्रम व्यर्थ रहा।
तुम राह बनाते हुए
आगे बढ़ते गये – बहुत दूर तक।
जान ही न पाये
कि पीछे छुटे हुए तुम्हारे नाम से
मैं पा सकता हूँ
तुमसे भी अधिक कुछ।

मैं अब समझ गया हूँ
कि तुम्हारी दूरी का अनुमान लगाते रहना
और उचक-उचक कर
तुम्हें देखने का प्रयत्न
निस्सार और निरर्थक है।
अब मैं यों करूँगा –
तुम्हारे नाम को लेकर ही
यहीं जम जाऊँगा – रोशनी में
यथा नाम – तथा व्यक्ति
सार्थक सिद्ध करने।


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