अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
10.30.2014


कितने प्रकरण, कितने प्रसंग

कितने प्रकरण, कितने प्रसंग
कितने ऋतुराजस समाहार
उन नैनों के आर-पार,
बस प्रेम – प्रेम के ही सरबस
वे प्रेमभरे भारी तरकश
कितना परवश रे मन विहंग
तू उड़ चला उन तक निर्दंग....

उन दो ओंठों के भिन्न स्वाद
कितना प्रेम, कितना प्रमाद
बस प्रेम – प्रेम में थे डोले
वे प्रेमभरे जब भी बोले
अमृतमय घोले राग रंग
कितने दायी, कितने दबंग
कितने प्रकरण, कितने प्रसंग....


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें