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ISSN 2292-9754

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06.17.2016


किंचित सी मुस्कान तुम्हारी

जन-संकुल
इस महानगर की रेल-पेल में
ओ प्रियदर्शन!
किंचित सी मुस्कान तुम्हारी…

जाने लोग कहाँ जाते हैं?

आगे-पीछे, दायें-बायें, - बड़ी चौकसी!
आवेगों से – संवेगों से – संयोगों से –
ख़ूब बचाते
हाथ नचाते
कथकली – कुचिपुड़ी हाव-भाव से
बेफ़िक्रे सब,
निगरानी में
कोई नहीं किसी की;
"चरैवेति"…. बस,
चरैबेति की ही धुनकी में
एक निमिष
या सहस कल्प की
वय स्मिति धृतिमान तुम्हारी…

जन-संकुल
इस महानगर की रेल-पेल में
ओ प्रियदर्शन!
किंचित सी मुस्कान तुम्हारी…


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