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ISSN 2292-9754

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10.30.2014


कल तुम्हारा जन्मदिवस है

मैं आज दिन भर सोचता रहा
कल तुम्हारा जन्मदिवस है
मैं तुम्हें क्या भेंट दूँ?

मैंने सोचा :
कोंपलों की ताज़गी भरे प्रस्फुटन
और आम्रमंजरी के सोंधेपन में लिपटी
एक निहायत सम्भ्रांत मुस्कान
तुम्हें भेंट कर दूँ....
लेकिन सदा वरद् की भाँति
वह तो तुम्हें पहले ही प्राप्त है।

तब मैं यों करूँगा
किसी नवजात कल्पना को
अनछुए शब्दों में गूँथकर
एक नन्ही सी कविता ही
तुम्हारे लिये लिख दूँगा....
लेकिन यह भी संभव न होगा
क्योंकि
प्रेरक के पास जाते ही
शब्दों के सहमकर अर्थ खो देने का भय है।

तब क्या भेंट दूँ मैं तुम्हें
अपना समर्पण?
जिसके स्वीकृत होने की दुःशंका
मुझे सदा बनी रहती है।
अथवा
तुम्हें संगी बना लेने का वह स्वप्न
जिसका चिर अभिलाषी मैं स्वयं हूँ।

क्षमा करना दोस्त!
तुम्हें देने के लिये
मेरे पास कुछ भी नहीं है
सिवा इस कामना के
कि तुम सदा यूँ ही संपन्न बने रहो,
किसी विपन्न भेंट की
तुम्हें कभी आवश्यकता न रहे।


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