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ISSN 2292-9754

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10.30.2014


बौरा गया हूँ मैं

एक लम्बे-
अंतहीन रास्ते पर
ठूँठ पेड़ सा खड़ा हूँ मैं।
छाँह की चाह भी
अब मुझसे सम्भव नहीं।
कोई भले, न माने – पहचाने
अपने जाने, बौरा गया हूँ मैं।
इस अन्तहीन रास्ते सी
अन्तहीन प्रतीक्षा में –
छोटी-छोटी पगडंडियाँ भी
हरे-भरे वृक्षों से घिर गई हैं
जंगल उग आये हैं – यहाँ-वहाँ।
छाँह और विराम की
अचिह्नी महत्ता से/अर्थवत्ता से –
सब पूरित हो गये हैं।

और
भव्य – दीर्घ राजमार्ग पर
गति – गति और गति
को सहता
मील के पत्थरों के उखड़े रंग देखता
अब सचमुच ही
पथरा गया हूँ मैं/
बौरा गया हूँ मैं।


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