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ISSN 2292-9754

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01.23.2019


प्रेम क़ब्र और पलाश

पता नहीं दूर जंगल में
क़ब्र दो प्रेमियों की है
या प्रेम की

कोलाहल से दूर
बस क़ब्र है और प्रेम है

कभी कभी जंगल से निकलता हुआ
पथिक कोई सुस्ताने के लिए
करता है क़ब्र पर विश्राम
तब क़ब्र की रूह को मिलता है सुकून

जब ग्रहण हटता है
और निकलता है चाँद
सितारे उतर आते हैं क़ब्र पर
तब क़ब्र से निकल
दो शरीरों की रूह
जो अब एक है
आलिंगनबद्ध होकर
चाँद को देखती है
सितारों से बातें करती है
चम्पा की डालियों को चूमती है

और तभी होती है आकाशवाणी
बस और नहीं
तुम्हें फिर से लेना होगा जन्म

तब रूह हँस कर
किसी शाख पर
ले लेती है फाँसी
खो जाती है ब्लैक होल में

सुना है क़ब्र के ऊपर
जो पेड़ है वो पलाश है

स्वेच्छा से उगता है पलाश
प्रेम, प्रेम भी स्वेच्छा से ही किया जाता है
और जीया, जीया भी स्वेच्छा से ही जाता है

अब दो प्रेमी क़ब्र के ऊपर पलाश बन जी रहे हैं


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