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04.09.2008
 

वतन
किरण सिंह


न जाने क्यों मेरा वतन, याद बहुत आता है मुझे,
सपनों में और तन्हाई में, यूँ ही तड़पाता है मुझे।

इसकी मिट्टी की ख़ुशबु, दिल से कभी जाती ही नहीं,
इक मीठा प्यारा सा अहसास, ये हमेशा दिलाता है मुझे।

इस की गोद में बचपन बीता, इस के संग हम बड़े हुये,
वहाँ बिताय हर इक पल, इक दास्तां सुनाता है मुझे।

देखने को तो दुनियां में और भी बहुत कुछ है लेकिन,
बहारों से भी सुन्दर नज़ारे, ये हमेशा दिखाता है मुझे।

इस जैसा कोई देश कहाँ, देश प्रेम सा प्रेम कहाँ,
ये देश मेरा अपना है, ये महसूस कराता है मुझे॥


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