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04.09.2008
 

मैं और मेरे साथी
किरण सिंह


कहने को मैं अकेली हूँ
वैसे तो हम चार हैं।
एक मैं
और मेरी परछाई,
पुरानी यादें
और तन्हाई॥

ये मेरे तीन साथी, मुझे अकेले नहीं रहने देते।
जब अकेली बैठती हूँ, मेरे पास चले आते हैं॥

की बार कहा है – तन्हाई से
कि तुम ही चली जाओ।
मेरी चिन्ता मत करो।
मैं अकेली नहीं हूँ,
मेरे पास यादें हैं,
मेरी परछाई है।

बाहर चाहे अन्धेरा है,
सुनसान रात है,
लेकिन
हवा भी तो गुज़रती है इधर से,
चाँद भी झाँक रहा है बादलों से,

लेकिन तन्हाई भी मेरे साथ ही रहना चाहती है।
उसका कहना है कि
यादें कौन सी टिकती हैं?
आती हैं, चली जाती हैं।
परछाई का क्या भरोसा
सुबह होने पर साथ छोड़ दे।

तन्हाई का कहना है, वो दिल के करीब है।
वो ख़ामोश है॥

यादें तो दिलो-दिमाग में
हलचल सी मचा देती हैं।
हवा भी रुकती नहीं,
छू कर गुज़र जाती है।

और परछाई तो बस चुप-चाप साथ चलती है।
और तन्हाई – चारों पहर, दिल के आस पास रहती है
ख़ामोश और शांत।
मेरे दिल की दोस्त है,
उस से मिलने अक्सर चली आती है।
और दिल भी जब तन्हाई से मिलता है,
तो उसे अच्छा लगता है।

दिल और तन्हाई का, नज़दीकी रिश्ता है,
जो निभा रहा है दिल, एक अरसे से।
और निभाता रहेगा शायद!

अब तो आदत सी हो गई है,
इन तीनों के संग समय बिताने की।
अच्छा लगता है इन तीनों के साथ।

ख़ामोश दिन, ख़ामोश रातें,
तन्हाई भरी भीगी बरसातें,
उदास पल, ग़मगीन बातें,
अब तो भीड़ से दिल घबराने लगा है।
अकेला पन अब भाने लगा है।
अपने इन तीनों दोस्तों के संग,
जीने में मज़ा आने लगा है।
जीने में मज़ा आने लगा है॥


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