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04.09.2008
 

बेटी
किरण सिंह


मेरा घर मुझे बहुत सुन्दर लगता है
इसलिये नहीं कि वहा ख़ूबसूरत सामान है,
मेरी मनपसंद चीज़े हैं
या फिर
वहाँ मुझे मिलता आराम है।
मुझे वह घर अच्छा लगता है,
क्योंकि वहाँ मेरे बच्चे रहते हैं।
वहाँ एक परियों जैसी मेरी बेटी रहती है।
जिस पे नाज़ कर सकती हूँ मैं,
वो प्यारी सी गुड़िया रहती है॥

वो जब छोटी थी,
तो उसके नन्हे नन्हे हाथ
मुझे बहुत प्यारे लगते थे।
वो उन हाथों से मेरा सर दबाती,
मुझे छोटी-छोटी चीज़ें पकड़ाती,
जब बहुत थक जाती थी मैं,
तो प्यारी प्यारी बातों से मेरा दिल बहलाती।

फिर वो थोड़ी बड़ी हुई
और मेरे सामने जब खड़ी हुई।
मुझे उस पर और भी ज़्यादा प्यार आने लगा था।
उसका हाथों में मेंहदी लगाना,
मेरी चुनरी लेके नाचना – गाना,
मेरा हाई-हील का जूता पहन कर,
वो उसका लड़खड़ाना,
ये सब मुझे बहुत भाने लगा था,
मुझे उस में अपना बचपन नज़र आने लगा था।

फिर वो थोड़ी और बड़ी हुई,
लम्बी भी हुई और मेरे बराबर आ खड़ी हुई।
अब वो सिर्फ़ घर में नहीं,
मेरे दिल में रहती है।
मेरे घर के फूलों में कलियों में रहती है।
मेरे आँगन की खुश्बू भरी गलियों में रहती है।
मेरे घर के हर कोने की खुशियों में रहती है।

अब वो सिर्फ़ परी नहीं, घर की लक्ष्मी है।
मेरी बगिया में उड़ती – फिरती इक सुन्दर तितली है।
प्यार से भरपूर वो इक ऐसी मूरत है,
मेरे ख़्याल में जिसकी हर माँ को ज़रूरत है।

मेरे दुख में दुखी होती है वो,
मैं उदास होती हूँ और रोती है वो,
मुझे अच्छे-बुरे की अक्ल भी देती है,
ग़मों से लड़ने की हिम्मत भी देती है,
मेरे घर का चिराग है वो,
मेरी आँखों की ज्योती है वो।
मेरी सबसे अच्छी सहेली है वो,
मेरी माला क कीमती मोती है वो।

कई बार मैं सोचती हूँ
कितने बदनसीब लोग हैं वो,
जिनके पास बेटी नहीं होती।
और उससे भी बड़े बदनसीब हैं वो,
जो घर आई लक्ष्मी को ठुकरा देते हैं।
जन्म से पहले ही बेटी की हत्या करवा देते हैं।
वो यह नहीं जानते कि बेटी की नहीं,
वो अपने सुखद भविष्य की हत्या कर रहे हैं।
इक बेमिसाल और बेहिसाब प्यार की हत्या कर रहे हैं।

कैसे लोग हैं?
जो बेटी को दूर भगाते हैं,
भगवान की भेजी देवी से पीछा छुड़वाते हैं।
इसी धरती पर होगा, उनके प्यार का लेखा जोखा,
जो अपने हाथों से कतल करवा कर
मुस्कुराते हैं।
और ऐसे लोगों से
मुझे सख्त नफ़रत है।
क्योंकि मुझे मेरी बेटी से बहुत मुहब्बत है।
मुझे हर बेटी से बहुत मुहब्बत है॥


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