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05.03.2012
 

सोच
किरण राजपुरोहित ’नितिला‘


आइये आइये! श्रीमती शर्मा, बहुत दिनों बाद दिखाई दी। कहिए क्या हालचाल है, बिटिया का रिश्ता तय हुआ कहीं?”

अरे कहाँ....आप तो जानती ही हैं अच्छे लड़के आजकल कहाँ मिलते हैं? कहीं घर में कमी, कहीं लड़के में कमी। नाज़ों पली बेटी है, हर कहीं तो नहीं दे सकते ना।

लेकिन पिछले दिनों मैंने जो लड़का बताया उसका क्या हुआ? बढ़िया नौकरी, सुंदर लड़का, भरा पूरा घर, माँ-बाप बहन भाई सब कुछ तो....

ना बाबा न, कहाँ माँ- बाप, भाई-बहन के बड़े परिवार में झोंक दूँ बेटी को? मैं तो ऐसा लड़का ढूँढ रही हूँ जिसके परिवार की कोई ज़िम्मेदारी न हो, अच्छी नौकरी हो। अपना कमाए, अपना खाए और बिटिया को फूल सी रखे, बस। ये भाई बहिन, सास-ससुर की सेवा मेरी बेटी से नहीं होने वाली। अरे! उनके खेलने खाने के दिन है न कि झंझट में पड़ने के....

लेकिन हर लड़के के माँ-बाप, परिवार वाले भी तो आस लगाए होंगे ना ।

अरे! नहीं, बिटिया प्रथम श्रेणी एम बी. ए. है, सिर पर पल्ला ओढ़े सबकी चाकरी नहीं करने वाली। आज़ाद खयाल की लड़की है, ज़िंदगी बेरोकटोक गुज़ारना चाहती है।..

खैर........ आपके बेटे की भी तो नौकरी लग चुकी है। उसकी शादी कब करने का विचार है?”

 अरे अच्छी लड़की मिल जाए तो आज ही शहनाई बजवा दूँ। मुझे तो पढ़ी लिखी, अच्छे संस्कारों वाली, सीधी सादी बहू चाहिए जो आते ही घर सँभाल ले और मुझे घर के कामों से छुट्टी दे दे बस! आप तो जानती ही हैं आजकल की लड़कियाँ घर के काम तो करना ही नहीं चाहती। आते ही पति पर न जाने क्या मंत्र फूँकती है कि बेटा तो समझो गया हाथ से। एक ही तो बेटा है हमारा। सारी पूँजी लगाकर पढ़ाया है। बहुत कुछ सोच रखा है हमने अपने बेटे बहू से हमारे भविष्य के लिए।

“.........!!!....????”

 


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