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05.03.2012
 

निश्चय
किरण राजपुरोहित ’नितिला‘


मेरे भीतर जब प्राण प्रक्रिया
प्रारंभ हुई तब
माँ की कोख में
विगत में भी हलचल हुई होगी,
मेरे भीतर के जीवांश ने
रातों में माँ को फिर जगाया होगा,
रह रह याद आये होगें
वो शब्द जो कुटुम्ब की
औरतें कह गई
जो आत्मीय जन ने कहे
जो गरम शीशे की मानिंद
कानों से हृदय को बेध गये;

नवजात क्रंदन ने जब
उत्सुकता जगाई थी,
बूढ़ी दाई नेआँचल हटा कुछ देखा और
मायूस सी मंत्रणा करने लगी गृहस्वामियों से,
भय व्याप्त हवा में सद्यः प्रसूता ने डूबते हृदय से
पहली और आखिरी बार सीने में भींचा था
नौ महीने सींचा वह प्राण पिंड
जो निर्दयता से झपटा जा चुका था,
निरीह, निस्तेज, बौराई माँ
निर्जीव भाँति विस्फारित आँखें पड़ी थी;
ठान चुकी थी किंतु इस बार
कर निश्चय अपार;

एक बार फिर ममत्व घोंटने की तैयारी थी
किंतु रौद्र दृष्टि से कंपा दिया था
नव प्रसूता वह चंडी सी,
हिला गई उस क्रूर परंपरा को
सामंती खोखली जड़ों को
जिसने दंभ की खातिर
पीढ़ी की सीढ़ी को,
सृष्टि को रौंद डाला था,
आवरण बन छुपा लिया था
सृष्टि को
मनुष्यत्व को
एक वंश को
फौलादी फैसलों की खोह में,
निस्तेज,
भयक्रांत खड़ा तक रहा था आडंबरी पुरुष वर्ग


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