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05.03.2012
 

नारी की सृष्टि
किरण राजपुरोहित ’नितिला‘


समस्त संसार में एक क्षेत्र है
जहाँ पुरुष का प्रवेश नहीं
नितांत नारी की सृष्टि है वह
पुरुष का समावेश सही,
गृह संसार का अनाड़ी है पुरुष प्राणी
दुनिया जीतने का दावा करने वाले
भी बगलें झाँकते यहाँ
नहीं असंभव ब्रह्माण्ड में विचरना किन्तु
कठिन है रसोई में चावल ढूँढना;
अन्नपूर्णा के सपनों का स्वर्ग
जहाँ यथार्थ से लोहा लिया जाता है
वर्तमान को सँवारे सँवारते
शुभकामनाओं के साथ
भविष्य रचा जाता है
तमाम झंझावातों का कवच है वह;
शंका है न डर, झिझक
डगर के काँटों से
बिना किसी बाधा के नारी निर्द्वंद्व
है चलती जाती
साम्राज्ञी की भांति
सभी बाधायें
चटकाती जाती
चुटकियों में सुलझाती विकट
पारिवारिक पहेलियाँ,
मानस संसार की व्याधियों का दमन
धैर्य से करती नारी
सहज सधे हाथों से साधती
घर परिवार और परिचित
बच्चों से लेकर नौकरों तक
भर ममत्व उंड़ेलती ;
समाज परिवार बंधुजन को एक
डोर से बाँधती;
पुरातन से अधुनातन सदैव
रुप भले नवीन नित
किंतु सदावाही है उसमें
ममत्व प्रेम स्नेह संघर्ष संतोष........


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