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05.03.2012
 

औरत
किरण राजपुरोहित ’नितिला‘


तुम औरत हो इसीलिये झेल पाई
पुरूषों को
जो नित्य ही मनुष्य के खोल
से बाहर आते हैं,
अधिकतर पुरूष का भी लबादा
नहीं रखते
बन जाते है हाड़ माँस के वहशी
सिर्फ मादा ही नज़र आती है
हर नारी
जो कभी माँ, बहन-पत्नी होती है,
भभूका सा काबिज हो जाता है
हर लेता है समस्त विवेक
पुरूष से,मनुष्य से,
ओ! कापुरूषों क्यूँ नही छोड़ देते
ये वहशीपन
जो दुनिया को गर्त में धकेल रहा है!


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