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08.09.2007
 
मुजरा
डॉ. कविता वाचक्नवी

 इन पतंगों ने
बहुत मुजरा किया
दरबार जिसके
वह, अँधेरा खोल
आँचल भर
कहे
अब लौट जाओ।


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