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| 08.09.2009 |
| कविता की जातीयता प्रभाकर श्रोत्रिय |
|
लेखिका
:
डॉ. कविता वाचक्नवी
प्रकाशक
:
हिन्दुस्तानी एकेडेमी
१२ डी
,
कमला नेहरु मार्ग
इलाहाबाद - २११ ००१
संस्करण
:
२००९
मूल्य
:
२२५ रुपये
पृष्ठ
:
३६६[सजिल्द].
'जातीय'
यहाँ
'राष्ट्रीय'
का
पर्याय है,
परंतु यह राष्ट्र
‘नेशन’
नहीं है। जातीय या राष्ट्रीय का गहरा सांस्कृतिक अर्थ है,
जो
भौगोलिक या राजनीतिक से अधिक सांस्कृतिक है। इस ग्रन्थ की लेखिका डॉ. कविता
वाचक्नवी ने राष्ट्र को परिभाषित करते हुए लिखा है- "जिसे हम भारतीय
संस्कृति कहते हैं,
उसके तत्त्वों का अन्वेषण भारतीय जातीयता की व्याख्या करने में समर्थ होगा।
" डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने राष्ट्र के तीन घटक माने हैं- भूमि,
जन
और संस्कृति। इनमें से किसी एक की भी अनुपस्थिति में राष्ट्र की कल्पना
संभव नहीं है। भारतीय राष्ट्र में
‘भूमि’
के
अंतर्गत,
वर्तमान राजनीतिक और भौगोलिक सीमा से बाहर ऐसे भूखण्डों का समावेश भी किया
जाता है जो परंपरा से उसके अंग रहे हैं और उसके सांस्कृतिक परिसर में आते
हैं,
परंतु बाद के दौर में किन्हीं राजनीतिक-भौगोलिक या अन्य कारणों से अलग जा
पडे़ हैं। यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि बृहत्तर भारत की अवधारणा उन भागों का
अधिग्रहण करने की आकांक्षा नहीं है। [न दूर दूर तक इसकी कल्पना है] क्योंकि
वृहत्तर अर्थ में
‘राष्ट्रीयता’
अधिकार का कोई दावा नहीं,
वह
सांस्कृतिक जुडा़वों की एक अमूर्त संहिति है।
संस्कृति
हमारे लिए दार्शनिक,
आध्यात्मिक,
नैतिक,
कलात्मक और प्रवृत्तिगत संसार की अनुगूँज है। वह मूलतः मनुष्य से,
प्रकृति से,
धर्म से,
मूल्य से,
आत्मा से,
समाज से,
विश्व से हमारे संबंधों की प्रकृति सूचित करती है। [इस सूची को बढा़या जा
सकता है] अर्थात हमारे अन्तर्सम्बन्धात्मक -बोध और मूल्य-संकल्पना का
स्वभाव या प्रकृति क्या है! इसे पहचान कर हम देशों,
संस्कृतियों या राष्ट्रों को समझ सकते हैं।
उदाहरण के
लिए पश्चिम प्रकृति से मनुष्य के संबंध द्वन्द्वात्मक मानता है। वह प्रकृति
पर विजय पाने का लक्ष्य रखता है,
जबकि भारत प्रकृति को चिति का स्वरूप मानते हुए प्रणत होता है। धर्म को वह
किसी एक समुदाय या पूजा विधि में केन्द्रित न मानते हुए उसकी बहुलता को
मान्यता देता है। वह धर्म का अर्थ अभ्युदय और कल्याण की प्राप्ति मानता है।
मनुष्य और समाज के बीच द्वन्द्वात्मक सम्बन्धों को मान्यता न देते हुए वह
समूह या समाज से व्यक्ति की लयात्मकता को मान देता है। विश्व से उसके संबंध
में आत्मविजय का भाव न होकर ग्रहण और सामंजस्य का भाव है। उसकी चाहत है-
‘आ
नो भद्राः क्रतवो यंतु विश्वतः -’संसार
का जो भी श्रेष्ठ है,
भद्र है उसे मैं अपना बना लूँ। यह ग्रहण है अधिग्रहण नहीं;
जिसके कारण देव जाति नष्ट हो गई थी। जयशंकर प्रसाद ने लिखा है कि देवताओं
को सब कुछ स्वायत्त था-
‘बल,
वैभव,
आनंद अपार’,
परंतु परिणाम क्या हुआ?
समूल विनाश। सब कुछ को स्वायत्त करने में नहीं,
सब
कुछ के श्रेष्ठ ग्रहण में ही कल्याण निहित है। आत्मा से भी भारतीय मनुष्य
का संबंध अहम् भाव का अनुभव नहीं है,
सर्वात्मवाद को वह अपनी शिराओं में पाता है - सबका विकास,
सबका उन्नयन,
सबका आनन्द भारतीय स्वभाव की मूल संस्कृति है।
भारत के
भौगोलिक,
राजनैतिक,
सांस्कृतिक चरित्र में सामासिकता है,
जिसके केन्द्र में है सहिष्णुता,
जिसे नरेश मेहता,
‘वैष्णवता’
कहते हैं
|
वैष्णवता
का मूल करुणा है। गाँधी की प्रार्थना में था
‘वैष्णवजन
तो तेणे कहिए जे पीर पराई जाणे रे’।
वैष्णवी भारत एक सहिष्णु,
संवेदनशील,
सामासिक भारत है,
संगम जिसका स्वभाव है। विश्वभर में क्या कहीं
‘संगम’
को
पावन मान कर पूजा जाता है?
संगम भारत की सामासिकता की बोध-भूमि है। संस्कृति प्रकारांतर से हमारी
सर्जनात्मक चेतना है जिसमें सौन्दर्य,
गतिशीलता,
उर्वरता,
संवेदनशीलता और कल्पनाशीलता है। वह भारत के लिए जड़ प्रत्यय नहीं है और
जिनके लिए है वे शायद भारत और भारतीय संस्कृति की आत्मा से परिचित नहीं
हैं। भारत की संस्कृति का निर्माण,
नीति के उपदेशों या धर्म ग्रंथों से नहीं,
काव्य ग्रन्थों से हुआ है। रामायण महाभारत तो सांस्कृतिक अवबोधन के काव्य
हैं ही,
वेद भी एक अर्थ में महान काव्य है। इसलिए भारतीयता का संधान भारतीय काव्य
में करना एक सार्थक कार्य है।
डॉ. कविता
वाचक्नवी ने अपने पर्यालोचन के लिए जातीयता की संकल्पना की दृष्टि से
आधुनिक हिन्दी कविता को चुना है। बीसवीं शती के प्रारम्भ से लगभग ९वें दशक
तक के कवियों को इसमें सम्मिलित किया गया है। यह समयावधि निरंतर लंबी हुई
है क्योंकि समय की गति निरंतर तीव्र होती गई है और इसी गति से कविता भी
बढ़ी है। भारतेंदु से लेकर उदय प्रकाश तक के काव्य-समय ने कितने परिवर्तन
देखे हैं। इसलिए कदाचित भारतीयता की अभिव्यक्ति को किसी एक ढांचे में ढालना
संभव नहीं हुआ है। भारतेंदु के समय में भारतीयता किस सामयिकता और
सांस्कृतिक अवधारणा में व्यक्त हुई है,
फिर मैथिलीशरण गुप्त और अन्य राष्ट्रीय भावधारा के कवियों में भारतीयता का
क्या स्वरूप रहा है?
छायावादी युग,
प्रगतिवादी युग,
नई
कविता और उत्तरकाव्य में भारतीयता किस रूप में उपस्थित है?
यह
सब देखना सरल काम नहीं है। इसके विवेचन में सर्वसमावेशिता का आग्रह प्रायः
रहा है। आशय यह कि ऐसी समस्त बातें यदि हम भारतीयता के भीतर समाहित करते
चले जाएँ जो युगानुरूप रचनाओं की विषय-वस्तु रही हैं तो स्वयं राष्ट्रीयता
या भारतीयता के अपरिभाषेय होने का संकट बना रहता है। तब यह जानना दूभर हो
जाता है कि हमारा आशय राष्ट्रीयता या जातीयता से क्या है और वह कौन-सा
काव्य है जिसे हम इसके बाहर रखते हैं?
कविता जी को इस समस्या का सामना करना पडा़ है। संभवतः इसीलिए उन्होंने
भारतीयता का केनवास काफी विशाल रखा है।
आधुनिक
युग की एक दूसरी समस्या यह है कि हम जैसे-जैसे आधुनिकता से उत्तर आधुनिकता
और पराआधुनिकता की ओर बढ़ते जा रहे हैं,
हमारे संबंध अपनी जातीय विरासत से खिसकते चले जा रहे हैं। ऐसे में यह
अपरिहार्य लगता है कि हम नए सिरे से एक ओर तो विरासत की व्याख्या करें और
दूसरी ओर अपने व्यवहार की समीक्षा भी करें। क्या कारण है कि नई पीढी़ अपनी
विरासत से तो परायापन अनुभव करे जबकि पश्चिम से आती विचारधाराओं या विचारों
को अपनाते हुए उसे ही आधुनिकता का पर्याय मानने लगे। यानी दूसरों की विरासत
तो नई और अपनी विरासत पुरानी। इस अंतर्विरोध की गंभीर समीक्षा की जानी
चाहिए। शायद इनके बीच से ही आधुनिकता का मार्ग प्रशस्त हो सकता है और
साहित्य और जातीयता के गतिशील संबंधों की सर्जनात्मकता पहचानी जा सकती है
तथा समय की आँधियों में बह जाने वाले समूह से अलग साहित्य का एक नया
रचनात्मक पाठ बनाने की पहल की जा सकती है।
डॉ.
वाचक्नवी के इस ग्रन्थ की विशेषता यह भी है कि उन्होंने साहित्य और जातीयता
के पारंपरिक संबंधों को पहचानते हुए भी इस संबंध को गतिशीलता दी,
उनका यह काम किसी हद तक नवीनतम जीन्स प्रौद्योगिकी के अनुरूप ही है जो
जीन्स और डीएनए में वंश,
जाति,
देश आदि के तत्ों की उपस्थिति सिद्ध कर चुकी है। इसी प्रक्रिया में वह
विकास की पुष्टि करती है। यह ध्यातव्य है कि संसार में सब कुछ चलित है,
यदि आधुनिकता की अवधारणा गतिशील है तो जातीयता की अवधारणा भी गतिशील है।
इसी पारस्परिक गतिशीलता में जातीयता और आधुनिकता की प्रीतिकर सन्निधि
पहचानने की कोशिश ही इस ग्रंथ का प्रयोजन भी है और चुनौती भी।
जैसे भाव
की चिरंतन उपस्थिति होने पर भी भावात्मक संबंधों की प्रणालियाँ बदलती रहती
हैं,
वैसे ही राष्ट्रीयता की चेतना बनी रहने के बाद भी समयानुसार राष्ट्र से
रचनाकार के संबंधों की प्रणालियाँ बदलती रहती हैं। इसका मोटा उदाहरण यह है
कि स्वाधीनता-संग्राम के दौर में कवियों के लिए राष्ट्रीयता या भारतीयता से
संबंध का अर्थ अलग था। उस समय व्यक्त राष्ट्रीयता मूर्त और सोद्देश्य थी,
जबकि आज़ादी के बाद राष्ट्र से जनता की तरह कवि के संबंध भी बदल गए। इसलिए
इस दौर में काव्य में राष्ट्रीयता की पहचान अलग ढंग से हो सकती है। यहाँ
आकर राष्ट्रीय,
सामाजिक,
राजनीतिक और नैतिक प्रश्नों को वह अपने केंद्र में रखती है। इस युग में
राष्ट्रीयता की साहित्य में पहचान कठिन हुई है जो बाद के काल में निरंतर
कठिनतर और कठिनतम होती चली गई है,
इस
हद तक कि लगने लगता है कि इन कवियों में राष्ट्रीयता या जातीयता की खोज एक
दकियानूसी सोच है। परन्तु कविता के विन्यास के ऐसे अनेक पक्ष होते हैं,
जैसे भाषा,
प्रतीक,
बिम्ब,
रूपक आदि,
जिनमें राष्ट्र झाँके बिना नहीं रहता। इसके अलावा राष्ट्रीय सोच बहुत कुछ
समकालीन राष्ट्रीय प्रश्नों से जुड़ जाता है। यहीं राष्ट्रीयता और इसके इतर
काव्य को पहचानना चुनौती बन जाता है। कभी-कभी यह सरलीकरण का शिकार हो जाता
है जो मूल आशय तक पहुँचने की दिक्कतें हैं।
डॉ.
वाचक्नवी ने यह बेहतर आँका है कि भारतेंदु युग,
राष्ट्रीय काव्यधारा युग और छायावादी युग के स्वाधीनता पूर्व के प्रत्यय
अलग प्रणाली और संज्ञा में ढले थे जबकि छायावादोत्तर और उसके भी उत्तर युग
में अलग प्रत्यय अलग प्रणाली में ढले हैं। अतीत के आदर्श का स्मरण एक युग
की जातीयता थी जिसमें प्रकृति और जीवन की अंतश्चेतना का उद्घाटन किया गया
था। इसके बाद देश में पसरे शोषित पीड़ितों के अधिकार और स्थिति का संज्ञान
लिया गया है। इसके बाद वरण कि स्वाधीनता और भिन्न-भिन्न सूक्ष्म मार्गों की
तलाश में निहित अभिव्यक्ति में राष्ट्रीयता थी और वर्तमान में अपने समय,
परिवेश,
मनुष्यता के बाह्यान्तर में घटित परिवर्तनों को व्यक्त करना भारतीयता माना
गया। नितांत आज में जो एक तरफ से भूमण्डलीकरण का दौर कहा जाता है,
राष्ट्रीयता की खोज शायद राष्ट्र की ओर से खडे़ होकर प्रतिवाद के स्वर हैं
या अन्य प्रकार की निष्पत्तियाँ हैं। समयानुसार बदलते साहित्यिक प्रत्ययों
और मुहावरों में जातीयता को परिभाषित करने की इस कोशिश पर ध्यान दिया जाना
चाहिए।
मैं डॉ.
कविता वाचक्नवी को एक अनिवार्य विषय [''
कविता की जातीयता'']
पर
हिन्दी पाठक का ध्यान आकर्षित करने और दूर तक राष्ट्रीयता की गतिशीलता को
कविता-धाराओं में पहचानने के दुस्तर कार्य को सम्पन्न करने के लिए धन्यवाद
देना चाहता हूँ। प्रवाहों के बीच एक निष्पक्ष धारणा से मूल्याँकन करने का
एक कठिन काम उन्होंने किया है। ( लेखक प्रख्यात आलोचक व पूर्वग्रह के सम्पादक हैं तथा भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक व नया ज्ञानोदय के संपादक रहे हैं ।) |
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