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09.01.2007
 
 बिटियाएँ
(साभार -‘मैं चल तो दूँ’)
डॉ. कविता वाचक्नवी

पिता !
अभी जीना चाहती थीं हम
यह क्या किया........
हमारी अर्थियाँ उठवा दीं !
अपनी विरक्ति के निभाव की
सारी पग बाधाएँ
हटवा दीं.......!

अब कैसे तो आएँ
तुम्हारे पास?

अर्थियों उठे लोग
(दीख पड़ें तो)
प्रेत कहलाते हैं
‘भूत’(काल) हो जाते हैं
बहुत सताते हैं ।

हम हैं - भूत
-------अतीत
समय के
वर्तमान में वर्जित.........
विडम्बनाएँ........
बिटियाएँ.........।


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