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09.01.2007
 
बच्चियो !
(साभार -‘मैं चल तो दूँ’)
डॉ. कविता वाचक्नवी

चुहल करती बच्चियो !
महमहाते रेशमी आँचल तुम्हारे
यकायक,जब कभी
छूकर गुजरते हैं
हमारी बाँह को, तो
कोई मानो
कह रहा हो -
बाँधना मत दूर
इक अनजान
ऐसे हाथ में
कि हम
मनो दूरी मनों पर
झेलती रोया करें
ढोया करें
हरदम एकाकी।


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