चुहल करती बच्चियो ! महमहाते रेशमी आँचल तुम्हारे यकायक,जब कभी छूकर गुजरते हैं हमारी बाँह को, तो कोई मानो कह रहा हो - बाँधना मत दूर इक अनजान ऐसे हाथ में कि हम मनो दूरी मनों पर झेलती रोया करें ढोया करें हरदम एकाकी।