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03.14.2015


लगता है!!

मेरी कोई कविता-
अब मरेगी नही।
कारण कई..सहमी -
सिसकती, सुलगती -
कवितायों को मैंने -
बेहद रुलाया है।

अनचाहा तड़पाया-
तकिए के नीचे -
जबरन सुलाया है l
निज विवशताओं का-
ताज पहनाया है।
कुछ को दफनाया है।

बेचारी मूक थी -
तभी कहर बरसाया है
बड़प्पन, वे भूली नहीं-
बेकसूर ठुकराया है।
अब ममता जागी-
तभी रहम आया है।

आज गद्गद हैं -
सिर चढ़ बोलती-
शब्द खुद टटोलती।
कलम की नोक से-
मालाएँ पिरो रही-
यौवन लौट आया हैl


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