अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
06.14.2014


काश!! ऐसा करें

उजड़ी बस्तियों, बिना छत के घरों का,
आओ! हम मिल कर, मुआयना करेंl
दीयों में तेल बाती, मन में नई चेतना,
कृशकाय तन में, गज़ब की शक्ति भरेंl

सिसकियों की धुनों, बाजू के तकिए में,
स्वर सकून का, नींद चैन की, हवा भरें।
नए लगते , कोने में रखी गाँठ से लेकर
ढाँप आएँ चीथड़ों में लिपटे, बदन उधड़े।

कल किस ने देखा, शायद हमारा न हो,
बाजी जीवन की, हारों का, सम्बल बनेl
मायूस होता मन, कई तस्वीरें देख कर
काश! पुरुषार्थ से, चटक रंग उनमें भरेl


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें