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ISSN 2292-9754

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02.03.2017


वो धोती–पगड़ी वाला

निरन्तर गतिशील जीवन, अब लड़खड़ाने लगा।
मात्र दो निवाले को, संघर्ष, मुँह की खाने, की खाने लगा।
चमचमाते रजत अंश नहीं, पसीने के रक्त बिन्दु हैं।
लुढ़क आए कपोलों पर, दु:ख भरे जो सिन्धु हैं।

वातानुकूलन में मदभरे प्यालों को– पीने वाले।
मोल मेरे श्रम का क्या जानो? तुम महलों में जीने वाले।
सभी को जीवन दान किया, मौन– हल ही खींचा सदा।
अपनी भी रोटी न मिली, दरिद्र मैं, अभावों में जीवन कटा।

जीवित रहा एक झोपड़ी में– मौसमी घासों से बनी।
लिपटा, पगड़ी– आधेक मीटर, कृश देह दो मीटर धोती में।
दो रोटी, दो मीटर कपड़े, दो–चार फुट के झोंपड़े में,
कल था– जीवित शव, मृत–भूमि पर लिपटा दो गज कपड़े में।

सोचा था– फावड़ा ले सूखी भूमि पर चलूँगा,
जीवन पथ कुछेक डग और भरूँगा।
जीवन पथ पर; न भाव दिया मुझे,
अन्तत: थके हारे मौन अब पदचाप हुए।

दस रुपये जो बचे थे, बीज और खाद के बाद।
उससे विष भी जब ना मिला, तो खरीदा कुछ ले उधार।
नि:शब्द अब पड़ा हूँ हे प्रिये! शिथिल हो तुम्हारी गोदी में।
चन्द पुरानी पीतल की चूड़ियाँ, तोड़ दोगी तुम खिन्न हो।
मैं तुम्हारा दोषी हूँ, किन्तु न धिक्कारना,
हूँ मैं व्यवस्था के लंगड़ेपन का प्रमाण।
त्याग रहा व्यवस्था की चन्द कौड़ियों में सिमटे प्राण।

ऊँचे–ऊँचे उन काग़ज़ के महलों में,
निमग्न रहने वालों से एक बार तो पूछती है।
मेरी देह–स्थिर, नि:शब्द और व्यथित,
कि वसीयत में अपने बेटे की, क्या लिखूँ मैं?
वही दो मीटर कपड़ा, विष की एक पुडि़या,
या आत्मघाती कर्ज़ का लम्बा–चौड़ा चिठ्ठा।

झकझोरकर मैं पूछता हूँ, तुम निरुत्तर क्यों खड़े हो?
अपने अन्नदाता के शव को रौंदते क्यों चल पड़े हो?
किन्तु, हे महल के स्वामी! तुम इस गर्व में कितना जिओगे,
अन्नदाता मर गया तो, तुम भी स्वयं ही मरोगे।
क्योंकि...
निरन्तर गतिशील जीवन, अब लड़खड़ाने लगा।
सिर्फ़ दो निवालों के लिए, संघर्ष मुँह की खाने लगा।


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