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| 07.06.2008 |
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करुण वेदना उन की सुन कर तुम तो बस मुस्काते जाओ |
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करुण वेदना उन की सुन कर तुम तो बस मुस्काते जाओ। जो बैठा हे तेरे भीतर उस के आगे वो
झुकता है। अँधियारे से टकरा कर तुम, तम
को दूर न कर पाओगे। मात्र तुम्हारी चाहत ही से कुछ न यहाँ परिवर्तित होगा। हवन कुण्ड की इस अग्नि में आहुति अब कोई न देगा। सूखी बंजर धरती फिर से करती है आवाहन
तेरा। किसे पड़ी है
’कपिल’ यहाँ पर कौन
सुनेगा दर्द तुम्हारा। |
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