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07.06.2008
 

करुण वेदना उन की सुन कर तुम तो बस मुस्काते जाओ
कपिल अनिरुद्ध


करुण वेदना उन की सुन कर तुम तो बस मुस्काते जाओ।
पंचम सुर में वो रोता है तुम कहते हो गाते जाओ।

जो बैठा हे तेरे भीतर उस के आगे वो झुकता है।
ड़े हो गये तुम क्यों तन कर, तुम क्यों कर इतराते जाओ।

अँधियारे से टकरा कर तुम, तम को दूर न कर पाओगे।
स्वयं को कर लो तुम ज्योर्तिमय, ज्योति प्रभा बिखराते जाओ।

मात्र तुम्हारी चाहत ही से कुछ न यहाँ परिवर्तित होगा।
फिर क्यों कर तुम सहमे से हो, क्यों कर तुम मुरझाते जाओ।

हवन कुण्ड की इस अग्नि में आहुति अब कोई न देगा।
समिधा सम तुम स्वयं ही जल की जन-जन को कहकाते जाओ।

सूखी बंजर धरती फिर से करती है आवाह तेरा।
बन जाओ तुम काली बदरिया प्रेम सुधा बरसाते जाओ।

किसे पड़ी है कपिल’ यहाँ पर कौन सुनेगा दर्द तुम्हारा।
उस को अपना साथी कर लो दुखड़ा उसे सुनाते जाओ।


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