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ISSN 2292-9754

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11.07.2016


जीवन संघर्ष

उस माँ के
दर्द भरे चेहरे को देखें
जहाँ दर्द ने
खो दी है अपनी आवाज़।
विश्वविद्यालया के युवा
आज तकिये के नीचे
मजबूर
रखने को सूइसाइड नोट
और
रच रहे है जीने का भरम
हत्या और आत्महत्या के बीच तानी रस्सी पर।

मुग़ालता कैसा?
क्या ये आत्महत्या नहीं?
जिसमें शामिल है
शासन
सत्ता व्यवस्था
और
स्वयं हम।
कौन सही
कौन ग़लत
तय करना कठिन-
आधारहीन स्थिति में
आधार की तलाश।
पकड़े हाथों में
शब्दों की पोटली
दुनियाँ के इस मेले में
ढूँढने निकले ज़िंदगी।-

कैसा क्रूर मज़ाक -
हम शोकसभा करेंगे
लेख लिखेंगे
गरमागरम बहस करेंगे
और-
करेंगे फिर इंतज़ार -
एक अगली आत्महत्या का
या
फिर हत्या का।
दरअसल -
इस शोकसभाओं के
बीच का समय -
हमारा जीवन है
हमारा संघर्ष है।


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