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ISSN 2292-9754

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11.08.2016


हाशिये की आवाज़

1)
"जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा
वो भारत देश है मेरा”
पुराना गाना
गुज़रा ज़माना॥

ये है
सन 1986 –
उरुग्वे का पुंटा देल इस्टेट
गहमा–गहमी के बीच
व्यापार वार्ताओं के चक्र का
प्रारम्भ॥
सन 1994 –
मोरक्को का माराकेश शहर
वार्ता चक्रों का अंतिम दौर
विश्व व्यापार संगठन का जन्म।
यह संगठन मात्र –
एक व्यापारिक समझौता नहीं
दो देशों
या
कुछ देशों के बीच
सामुहिक ख़ुशहाली का
बल्कि
राष्ट्र सीमाओं से परे
साम्राज्यवादी राजनीति और अर्थनीति के
विस्तार का
व्यावहारिक भौगोलिक फैलाव था यह।
एक कारगर हथियार
विकासशील राष्ट्रों
की बाज़ारों पर-
चोर दरवाज़े से घुस
सब हड़प जाने की
एक साज़िश –
और
इसे बख़ूबी अंजाम दिया
विकसित देशों के एजेंट बन
विश्व बैंक
और
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोश ने।
खो दिया –
प्रजातांत्रिक राष्ट्रीय सरकारों ने
स्वतंत्र निर्णय की क्षमता
और
बन गए
नवसाम्राज्यवादी शक्तियों की
हाथों की कठपुतली।

2)
दिखाये गए लुभावने सपने -
बाज़ारों की
स्वस्थ प्रतिस्पर्धा
पैदा करेंगी –
नए अवसर
बाज़ार लाभ
किसानों के लिए
उत्पादों के बेहतर मूल्य।
शासक वर्ग ने लिया फ़ैसला –
एक ओर
विकसित देशों के
इफ़रात सबसिडी प्राप्त
उन्नत पूँजीवादी कृषि
और
दूसरी तरफ़
अरक्षित
अविकसित
पूर्णतः उपेक्षित
भारतीय किसान।
प्रतिस्पर्धा असमान –
एक ज़मीन
दूसरा आसमान॥
वास्तव में
एक मृगमरीचिका
बियावान रेगिस्तान में
हर क़दम के साथ
दूर
और थोड़ी दूर॥

3)
इंसान को तो
कुपोषण से न बचा सकी
सरकार
होशंगाबाद और हदादा
हो चुकी हैं
बंजर और बेज़ार।
प्रोटीनयुक्त सोयाबीन की खेती
करेगी दूर देश की कुपोषण
निर्यात योग्य फ़सलों का करें उत्पादन
पढ़ाया गया यह पाठ
विश्व बैंक और आई.एम.एफ. द्वारा
और
बिना सोचे समझे रट लिया है इस ज्ञान को
आज्ञाकारी तोते की तरह।
करते रहते हैं पाठ
बरसाती मेंढक की तरह
दिन – रात
टर्र-टर्राटे हुये।
और इस तरह हुआ दौर शुरू ..........
कुचक्र, शोषण, दमन
और
आत्महत्याओं का॥

4)
बुर्किनाफ़ासो और माली
जैसे देशों को
मानचित्र में
ढूँढते – ढूँढते
आँखें
चुनमुना जाती हैं
लेकिन
ख़िलाफ़त में
उठतीं हैं आवाज़
यहीं से –
"आपकी कृषि सब्सिडियाँ हमारा गला घोंट रहीं हैं"
दब्बू और दलाल सरकार में
ये दम-ख़म कहाँ
कि
उचित शिकायत भी
करा सके दर्ज़?
वैसे –
करोंड़ों की आबादी है हमारी –
धर्म, जाति, प्रांत
और
प्रातिष्ठा के नाम पर
एक के बदले दस सिर काटने का
माद्दा रखते हैं हम।
ये क्या है कम?

5)
साम्राज्यवादी देशों द्वारा प्रेरित
भूमंडलीकरण कि नीतियों ने
कर दी है निर्मित
एक ऐसी नवऔपनिवेशिक स्थिति
अनायास जो कर देतीं हैं
यादें ताज़ी
पुराने औपनिवेशिक दिनों की।
संसाधनों से लबरेज़ इस धरती का दोहन
किया गया जिंस की तरह
बेदर्दी से।
आज
पुनः
विश्व व्यापार नीतियों की तहत
आ चुके हैं इस दानवी चपेट में
हमारे किसान
पूरी तरह॥

6)
ज़मीन, श्रम, संसाधन हमारे
लेकिन
बहाते हैं पसीना
"उनकी" ऐशों आराम की चीज़ों पर।
कल तक हम
चाय, चीनी, कॉफी और रुई
करते थे निर्यात
आज –
हमारे फल, फूल और सब्जियाँ
बढ़ा रहीं हैं शोभा
"उनकी" दुकानों की॥

7)
और
इस तरह
हुआ शुरू
भारतीय किसानों की
लोमहर्षक त्रासदी का दौर –
निरंतर
घाटा सहते
हमारे किसान
छोड़ खेती
बनने लगे
दिहाड़ी मज़दूर
और
हुये मजबूर
भटकने को
शहर दर शहर
विस्थापित होकर॥
लगभग पाँच करोड़ से
अधिक किसान
धो बैठे हैं हाथ
अपनी ज़मीनों से
आज॥
विश्व व्यापार है
मात्र एक उपकरण
ताकतवर राष्ट्रों द्वारा
ग़रीब देशों के शोषण का
ग़लत दिशा में किया गया
उदारीकरण॥
अरबों किसानों के
हितों की अनदेखी
जो
धनवानों की दुनियाँ में
नहीं रहते॥
और कुछ नहीं -
धोखाधड़ी की है
ये नायाब मिसाल॥

8)
यहाँ का
भूखा, नंगा, लाचार, बेचारा
ग़रीब किसान, मज़दूर
जो आत्महत्या को है अभिशप्त
करता है एक ही सवाल
अपने बुद्धिजीवी भाइयों से –
बताओ –
सोफिया मर्फी "कृषि क्षेत्र में मुक्त व्यापार : एक बुरा विचार"
इसका वक़्त कब होगा पूरा?
"किसानों की आत्महत्या क्यों" – पी. साईनाथ? कोई जवाब?
"किसानों की समस्याओं पर कब संजीदा होंगी सरकारें" - ज़हीर खान?
"तबाही का रास्ता" कब बंद होगा उत्सा पटनाइक?
या फिर –
फिलिप मैक्माइकल तुम केवल ऐतिहासिक संदर्भ ही देखोगे?
या
इंतज़ार करोगे तब तलक़
जब स्वयं
अपने बिरादरी के साथ
हम
दर्ज़ होकर रह जाएँ –
दिन, महीने, साल वाले कलैण्डर में
बन इतिहास?
(बोल्ड किए गए नाम अर्थशास्त्रियों के हैं)

9
आज एक बार फिर
स्कूल मे पढ़े पाठ
दिमाग़ में कौंध जाते हैं
अनायास –
समझ नहीं पाती हूँ
यक़ीन नहीं होता
क्या, सचमुच इतिहास
अपने को दोहराता है?


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