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ISSN 2292-9754

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11.07.2016


दासियाँ सब जानतीं हैं

दासियाँ सब जानतीं हैं –
देखतीं हैं
सुनती हैं
उनकी चुप्पी
समोय रहती है
अपने आप में
हज़ारों हज़ार प्रश्न
समंदर में
बूँदों के समान॥

देखा है दासियों ने –
पलटते
तख़्तो-ताज
मिलते हुये
ख़ाक में
और
गर्व को
होते हुये
चूर–चूर
लिखे जाते हुये
नए इतिहास को
आख़िर,
त्रिजटा के रूप में
थी साक्षी
उसी
अशोकवाटिका में॥

देखा है दासियों ने –
इतिहास को
अपने आपको
दोहराते हुये
और
सबक न लेते हुये
उन अपौरुषय
पौरुष को
जिन्हें कभी
क्षमा नहीं किया गया
ठीक उसी तरह
जैसे पितामह भीष्म को॥

देखा है दासियों ने –
शतरंज की बिसात पर
लुटते हुये
आबरू औरत की
ख़ुद अपनों के हाथ।
भला,
भुला पायीं हैं क्या
आज भी वे
द्रौपदी की आर्त पुकार?

देखा है दासियों ने –
राजमहलों की
चकाचौंध
और उसके पीछे
रोती
रिक्त
जीवन खंगालती
उन
जीवित- मृतात्माओं को
जो होकर भी
न होने की हैं
साक्षात प्रमाण
जीवन जिनका
व्यक्तिगत कुचक्रों का
मात्र रह गया है बनकर
होम॥

तो
क्या
इतना सब
जानती है दासियाँ?
तन गईं भृकुटियाँ
नज़रें हुईं तिरछी
मान–मर्यादा
सामाजिक प्रतिष्ठा
नीति – धर्म
बनाने लगें
अपने–अपने समीकरण॥

दरख्तों के साये में
उठने लगे बबूले।
जीवनदायनी
सूर्य की किरणें
लगी बरसाने अंगारे
और
देखते ही देखते
निगल लिया इस
दावानल ने
उन वृक्षों को
जो
सूखे
चरमराए
ठूँठ
आश्रयविहीन –
पर,
थे तादात में
बढ़े–चढ़े।
कुछ पल
बस, कुछ पल
और
सब ख़त्म॥

पर इतिहास?
फिर ...
एक बार फिर
करता है प्रश्न।
ख़त्म कर दो सब
मिटा दो वजूदों को
कर दो फेर – बदल
लिखो –
मनमाने गौरव ग्रंथ
पर...पर क्या कभी
पन्ना धाए के
ऋण से हो सकोगे
उऋण
पीढ़ी दर पीढ़ी?

दासियाँ ये भी जानती हैं।
अब –
दासियाँ चुप नहीं रहतीं।
करतीं हैं सवाल
और
हक़ से
माँगती हैं जवाब।
प्रश्न दर प्रश्न
उत्तर – प्रत्युत्तर
चलते रहते हैं।
हाशिए से
केंद्र की ओर
है
इनका संचरण।
रानियों सी
राज करने की नहीं
बल्कि
अपने अस्तित्व के
पहचान की
और
इस पहचान को
शिद्दत से जीने की॥


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