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ISSN 2292-9754

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02.08.2017


कॉमेडी की भाषा: हिंदी में अनूदित शेक्सपियर के सुखांत नाटक का अध्ययन

भाषा किसी भी संस्कृति की वाहिका होती है इसलिए एक भाषा में व्यक्त सामग्री को दूसरी भाषा में अंतरित करना और कुछ नहीं बल्कि एक भाषा में निहित संस्कृति को दूसरी भाषा में प्रत्यारोपित करना है। हर भाषा की व्याकरणिक एवं भाषिक संरचना कुछ अंशों में भिन्न होती है। अतः एक ही अनुभूति को लेकर की गई दो भिन्न भाषिक अभिव्यक्तियाँ एक नहीं होती। ऐसी स्थिति में अनुवाद अपरिहार्य है। अनुवाद केवल एक भाषा के संस्कारों का ही नहीं बल्कि उस भाषा में पिरोई गई मानवीय संवेदना का भी अंतरण है। भाषा की कोई भी रचना एक सामाजिक कर्म है इसलिए इन रचनाओं के अनुवाद भी सामाजिक दायित्व हैं। अनुवाद की प्रक्रिया में न केवल अनूदित कृति निरंतर जीवन प्राप्त करती चलती है बल्कि जिस भाषा में उसका अनुवाद होता है, वह भाषा भी नए कथ्य और नई शैली से समृद्ध होती है। किसी रचना के एक से अधिक अनुवाद उस रचना की गहनता और प्रासंगिकता के सूचक होते हैं। जैसे मनुष्य सतह पर नहीं जीता वैसे ही भाषा केवल सतह पर नहीं जीती। भाषा समाज और संस्कृति के विकास के साथ बहुस्तरीय, बहुआयामी और बहुअर्थीय होती जाती है।

सृजनात्मक साहित्य का अनुवाद समकालीन साहित्य के साथ ही युगों का अंतर रखने वाली साहित्यिक रचनाओं का भी होता है। मूल रचना तथा अनूदित रचना एक ही समय की भी हो सकती है तथा मूल और अनूदित रचना के समय में शेक्सपियर और रांगेय राघव के काल जैसा, युगों का अंतर भी हो सकता है। रचनाकाल और अनुवादकाल के अंतर के आधार पर स्पष्ट है कि जिस देश-काल में मूल साहित्य की रचना की गई है, उस देश-काल की संस्कृति, सभ्यता, रीति-रिवाज़ तथा साहित्यिक रूढ़ियों आदि की पूरी जानकारी अनुवादक को हो। यह आवश्यक इसलिए है क्योंकि लेखक की मानसिक संरचना, शिक्षा-दीक्षा, परिवेशगत वातावरण, संस्कार, जीवन से प्राप्त अनुभव एवं जीवन के प्रति उसकी दृष्टि का, उसकी साहित्यिक रचना पर प्रभाव होता है। अनुवादक इन सबको जाने समझे बग़ैर न तो अच्छा अनुवाद कर सकता है और न साहित्यिक कृति तथा लेखक के साथ पूर्ण न्याय कर सकता है। इसी जानकारी के आधार पर अनूदित पाठ में गहनता, प्रामाणिकता तथा यथातथ्यता के गुण को स्थान प्राप्त होता है। अनुवाद की समस्या केवल भाषाई समस्या नहीं है बल्कि मूल कृति के कथ्य, संस्कृति, भाव-बोध, विचारों एवं अनुभवों से तादात्मय स्थापित करते हुए अपनी भाषा में पुनः सृजन की भी है।

नाट्यविधा एवं नाटककार के लिए अभिव्यक्ति के समस्त उपकरणों में से भाषा ही सर्वाधिक सजीव माध्यम है। नाटक में भाषा के द्वारा अभिव्यक्ति कथोपकथन के विभिन्न रूपों में दृष्टिगत होती है। जिस वैयक्तिक प्रतिभा के द्वारा नाटककार उस भाषा का प्रयोग करता है वह उसकी शैली कहलाती है। अभिनेताओं द्वारा पात्रों का अभिनय कथोपकथनों की शैली द्वारा संचालित होता है। चूँकि नाटक की रचना सामान्य जनता के समक्ष अभिनीत होने के लिए की जाती है अतः उसमें जनसामान्य द्वारा बोधगम्य भाषा का प्रयोग ही अपेक्षित है।

शेक्सपियर रंगमंच के शीर्षस्थ नाटककार की नहीं बल्कि कुशल अभिनेता भी थे। अपने नाटकों में उन्होंने समाज के प्रत्येक वर्ग को स्थान दिया। उनके नाटकों की कथावस्तु यद्यपि राजवंशों से संबंधित है लेकिन फिर भी यथास्थान उनमें लोकजीवन तथा लोकगाथाओं की झाँकी भी दिखाई देती है। दरबारी जीवन के वैभव, ऐशो-आराम, रस्मों-रिवाज़ का यदि एक ओर वर्णन है तो दूसरी ओर नाटकों में ग्रामीण जीवन, पशुपालक संस्कृति का भी चित्रण किया है। उनके पात्र जीवन के रंगों में रँगे, समाज के प्रत्येक तबक़े का प्रतिनिधित्व करते हैं। नाटकों का प्रत्येक पात्र अपने साथ लाता है अपना सामाजिक परिवेश-जिसमें उसकी मान्यताएँ, विश्वास, रीति-रिवाज़, नैतिक मूल्य, कर्त्तव्य आदि आते हैं। साथ ही आती है भाषा, जो उनके मनोभावों को प्रकट करती है। प्रत्येक समाज तथा संस्कृति की अपनी भाषा होती है। मान-सम्मान, गाली-गलौज़, ताने-तिसने, प्यार, अपनापन, मोहब्बत जताने की भाषा होती है जो दूसरी भाषा से होती है निहायत अलग। शेक्सपियर की भाषा में इन सबका समावेश है। उनकी भाषा अपने समकालीन राजनैतिक तथा सामाजिक जीवन का न केवल सफल चित्रण करती है बल्कि अनेक ऐसे मुहावरों को भी गढ़ती है जो आज के जीवन में भी प्रचलित हैं। इतना ही नहीं, उनके गढ़े मुहावरे आज अंग्रेज़ी भाषा की रीढ़ की हड्डी बन गए है। शेक्सपियर एक सजग रचनाकार थे। अपने नाटकों में न केवल उन्होंने स्कूली दिनों में पढ़ाई जाने वाले पाठों, कहानियों या नीति शिक्षाओं का उपयोग किया बल्कि मिथकों, लोक कथाओं, इतिहास तथा प्राचीन गाथाओं के भी उदाहरणों का जमकर प्रयोग किया। इनमें से अधिकांशतः रोमन तथा यूनानी पौराणिक कथाओं के संदर्भ हैं। इसके अतिरिक्त फ्रांसीसी तथा लैटिन भाषा के शब्दों का प्रयोग भी कई नाटकों में दिखाई देता है।

भाषा के जितने रूप तथा रंग हो सकते हैं या कि एक भाषा जितने रूपों में अपने-आपको ढ़ाल सकती है, वे सब शेक्सपियर की रचनाओं में दिखाई देते हैं। रूपक, उपमा तथ श्लेष उनके प्रिय अलंकार हैं। श्लेष में उनका मन विशेष रूप में रमा है। शब्दों की जादूगरी के साथ एक-एक शब्द से वे जिस तरह खेलते हैं, अर्थों से चमत्कार उत्पन्न करते हैं, वह प्रशंसनीय है। प्रत्येक नाटक में उनका यह शब्द-चमत्कार दर्शकों तथा पाठकों को मंत्रमुग्ध कर देता है। नाटकों में इसका प्रयोग शेक्सपियर ने हास्य-व्यंग्य की सर्जना के लिए किया है। भाषा में एक ओर व्यंग्य एवं वक्रोक्ति है तो दूसरी ओर द्विअर्थक शब्दों की भरमार भी। पात्र किसी शब्द का प्रयोग एक अर्थ में करता है तो मूर्ख, विदूषक या मसख़रा उसका दूसरा अर्थ लेकर चमत्कार तथा हास्य का सृजन करता है। जैसे-

Pet : It was I won the wager, though you hit the white;
1. पैट्रूशियोः यद्यपि तुमने "सफेद की तरफ़ निशाना लगाया था लेकिन मैंने ही शर्त जीती…।

(परिवर्तन, रांगेय राघव, पृ. 112)

यहाँ White के दो अर्थ हैः (1) वह केंद्रबिंदु, जिसकी ओर निशाना लगाया जाता है। (2) सफेद। यह बियांका के लिए प्रयुक्त है। पैट्रूशियो सफेद कहकर बियांका की ओर संकेत करता है।

भाषा-चातुर्य का जो प्रयोग शेक्सपियर के नाटकों में मिलता हैं, वह अन्य असंभव है। दो अर्थों अर्थात् श्लेषमूलक शब्द देकर मंच से जनता को हँसाना ही ऐसे शब्द चातुर्य का उद्देश्य था। कहीं-कहीं उक्ति-चातुर्य में कवि ने अश्लीलता को भी नहीं छोड़ा है। शेक्सपियर के नाटकों में लक्ष्यार्थ और व्यंग्यार्थ ही प्रधान और नियामक होते हैं। इनके नाटकों में कई जगह भाषा के भ्रष्ट रूप भी दिखाई देते हैं। संभवतः इसका प्रयोग किसी वांछित प्रभाव के लिए करते हैं। भाषा का कलात्मक तथा निखरा हुआ रूप इनके संवादों में दिखाई देता है और यह गुण नाट्य संवादों में हर स्तर पर मुखर है।

शेक्सपियर की भाषा काव्यात्मक है। स्वराघात, अनुतान-उतार-चढ़ाव, तारतम्यता, शब्दश्लेष विविधता आदि भाषा की विशेषताएँ हैं जो नाटकों के संवादो को एकरस, सपाट तथा रुक्ष होने से बचाती है। अपने नाटकों में वे विषयवस्तु के अनुरूप ही शब्द, वाक्य-योजना तथा शैली का प्रयोग करते हैं। शेक्सपियर की भाषा के बारे में हम जितना जानने की कोशिश करते हैं उतना हीं उसके भाषिक कौशल के कायल हो जाते हैं। भाषा में सजीवता, प्रवाहमयता तथा रवानगी के साथ कहीं उनका विषादमयी रूप तो कहीं प्रफुल्लता तथा जीवंतता भी हमारे सामने आती है।

रंगमंच की दृष्टि से शेक्सपियर की रंगभाषा बेहद सधी तथा कसी हुई है। इनके नाटक लिखे ही रंगमंच के लिए जाते थे अतः उन सब बिंदुओं को इनकी रचना करते समय ध्यान में रखा गया था। मंच पर कथित एक-एक संवाद लोगों को मंत्रमुग्ध कर देते थे। कई बार तो इनके नाटकों के संवाद या कुछ पंक्तियाँ दूसरे नाटककारों द्वारा अपने नाटकों में प्रयुक्त किए गए हैं। हर मौके, हर अवसर के लिए कोई-न-कोई जुमला इनके नाटकों में ऐसा मिल ही जाता है जिनका प्रयोग आज भी हम किए बिना नहीं रहते। एक महान रचनाकार की पहचान भी यही है कि उसके द्वारा गढ़े गए शब्द तथा मुहावरे आम जनता तथा जीवन में कितने स्वीकृत हुए है। चार सौ साल बाद भी ऐसे शब्दों का भाषा का अंग बन जाना उनका धड़ल्ले से प्रयोग, रचनाकार की महानता का सबसे बड़ा प्रमाण हैं। ऐसे रचनाकार किसी एक काल विशेष के नहीं होते बल्कि वे तो कालजयी होते हैं। शेक्सपियर के बारे में यह बिना शक कहा जा सकता है।

शेक्सपियर के नाटकों का अनुवाद करते हुए अनुवादकों ने उनकी भाषा-शैली का पूरा ध्यान रखा है। अनुवादकों की शैली में उनके व्यक्तित्व की भी छाप दिखाई देती है। भारतेंदु हरिश्चंद्र के अनुवाद में देशज शब्दों के साथ ही मुहावरों का प्रयोग हुआ है। उनके अनुवाद में हमें वर्णनात्मक, भावात्मक तथा काव्यात्मक शैली के दर्शन होते हैं। मूल भाषा की शैली को ध्यान में रखते हुए अनुवादक ने ये शैलियाँ अपनाई हैं। रांगेय राघव द्वारा किए गए अनुवादों की शैली तत्सम प्रधान है। कहीं-कहीं प्रसंगानुसार भावपूर्ण तथा आवेगप्रधान शैली का भी प्रयोग किया है। रजत कपूर की भाषा उर्दूमिश्रित हिन्दी या हिन्दुस्तानी है। उनके अनुवाद में उपहासास्पद, कुतूहलपूर्ण, तर्कप्रधान शैली के दर्शन होते हैं जो मूल नाटक के प्रसंगानुसार हैं। रंगमंच के कलाकार होने के कारण इनकी भाषा-शैली में रंगमंचीय तत्त्वों का पूरा ध्यान रखा गया है। रघुवीर सहाय के अनुवाद में हिन्दुस्तानी भाषा में अवधी बोली की छौंक लगाई गई है। इनके अनुवाद में भावात्मक, तर्कप्रधान तथा काव्यात्मक शैली के दर्शन होते हैं जो मूल नाटक की भाषा-शैली को पूर्णतः ध्यान में रखकर प्रयुक्त किए गए हैं। तुकबंदी तथा संगीत जो शेक्सपियर की शैली है, उसे सामने रखकर लक्ष्यभाषा में अनुवाद किए गए हैं। उपेंद्र के अनुवाद में हिन्दी के देशज, तद्भव आदि शब्दों का प्रयोग करते हुए भाषा को यथासंभव सरल रखने के पक्षधर हैं। इनके अनुवाद में आवेगप्रधान, भावात्मक, दार्शनिक तथा काव्यात्मक शैली के यथास्थान दर्शन होते हैं। शेक्सपियर ने अपनी कॉमेडी में प्रसंगानुसार विभिन्न शैलियों का प्रयोग किया है। कथानक, पात्र, चरित्र-चित्रण, संवाद, उद्देश्य आदि को ध्यान में रखते हुए उनके नाटक में शैलीगत विविधता के दर्शन होते हैं। कुछ उदाहरणों द्वारा हम देख सकते हैं कि किस प्रकार से मूल रचना की आत्मा को उतारने की कोशिश में कहीं तो अनुवादकों को सफलता मिली है तो कहीं नहीं।

Oliver : (Aside) Now will I stir his gamester, I hope I shall see an end of him.
ओलिवरः (स्वगत) अब मैं ऑरलैंडों के दुस्साहसी यौवन को उभारूँगा कि वह चार्ल्स से भिड़ जाए। कल वह मरेगा, मुझे पूरी आशा है।

(जैसा तुम चाहो, रांगेय राघव, पृ. 15)

'Gamester' का कोशीय अर्थ होता है "जुआरी" लेकिन अनुवादक ने इसका अनुवाद दुस्साहसी यौवन के रूप में किया है। "वह चार्ल्स से भिड़ जाए"- यह वाक्य मूल में कहीं नहीं है। इसे मूल में जोड़ा गया है। व्याकरणिक दृष्टि से "मुझे पूरी आशा है कि कल मैं/उसका/अंत देख सकूँगा/ नाश देखूँगा- हिन्दी भाषा के अधिक अनुकूल है।

Shy : (aside) These be the Christian husbands!
(स्वगत) वह है ईसाई जाति पति, जो अपनी पत्नियों को इतना सस्ता समझते है कि अपने स्वार्थों को पूरा करने के लिए उनका बलिदान देने को तत्पर है।

(वेनिस का सौदागर, रांगेय राघव, पृ. 90)

शाइलॉकः (आप ही आप) इन आर्यपतियों की बातें सुनों!

(दुर्लभ बंधु, भारतेंदु हरिश्चंद्र पृ. 521)

ईसाइयों के प्रति यहूदी शाइलॉक की नफ़रत यहाँ खुले तौर पर दिखाई देती है। रांगेय राघव ने भी मूल संवाद की पूरी व्याख्या कर डाली है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने मूल संवाद को लक्ष्य भाषा में उसकी प्रकृति तथा मंचीयता को ध्यान में रखते हुए अच्छा अनुवाद किया है। भारतेंदु ने ईसाई की जगह आर्य शब्द को हो रखा है। इस नाटक का रूपांतरण करने के कारण इस शब्द का प्रयोग किया है। जो नफ़रत और व्यंग्य का भाव मूल में है वह भारतेंदु के संवाद में उभरकर आया है। रांगेय राघव की व्याख्यात्मक संवाद में वह "प्रभाव" लुप्त हो गया है।

श्लेषपूर्ण संवाद तथा द्विअर्थक शब्दों के प्रयोग से भी नाटककार ने हास-परिहास की सर्जना की है। मालिक किसी शब्द या संवाद का प्रयोग एक अर्थ में करता है और नौकर उसका कोई दूसरा अर्थ लगाकर सारा वातावरण बदल देता है। सबसे ज़्यादा हँसी ऐसी स्थितियों पर आती है जहाँ कोई पात्र धैर्यपूर्वक किसी की बात सुनने को राज़ी नहीं होता और विवादपूर्ण स्थिति पैदा हो जाती हैं

विदूषक: अच्छा मालकिन! आप क्यों मातम बनाती है?
ओलिविया: ओ मूर्ख! अपने भाई की मौत पर।
विदूषक: तो मालकिन! उनकी आत्मा नरक में होगी?
ओलिविया: मूर्ख! वह स्वर्ग में है।
विदूषक: तब तो श्रीमती! आप ही बड़ी मूर्ख हैं क्योंकि आप आत्मा के स्वर्ग में होने पर मातम मना रही हैं।…

(बारहवीं रात, रांगेय राघव, पृ. 24)

कुछ संदर्भ लोककथाओं पर आधारित हैं तो कुछ विभिन्न धर्मों तथा जातिगत विशेषताओं अथवा मान्यताओं पर आधारित हैं। उदाहरणार्थ,

व्यापारीः आप जानते हैं, पैण्टीकोस्ट के मेले से आपके ऊपर यह ऋण चला आ रहा है---।

(भूलभुलैया, रांगेय राघव, पृ. 58)

ईसाइयों का उस दिन के उपलक्ष्य में मेला जब ईसामसीह की आत्मा उनकी मृत्यु के पश्चात् इस पृथ्वी पर पुनः उतर कर आई थी। इस प्रकार के संदर्भों को जस के तस अनुवाद में रखा गया है और पाद-टिप्पणी में उसे स्पष्ट किया गया है।

लेकिन कुछ स्थान अनूदित नाटक में ऐसे भी हैं जहाँ अनुवादक ने प्राचीन संदर्भों को पाद-टिप्पणी के माध्यम से समझाया नहीं है। ऐसे स्थलों पर पाठक वाक्य पढ़कर केवल अंदाजा लगाता है कि इसका संदर्भगत अर्थ क्या हो सकता है। ये त्रुटिपूर्ण अनुवाद के उदाहरण है। कुछ उदाहरण हैं जैसेः-

सीलियाः जहाँ कहीं भी गई हैं वहाँ "जूनो" के हँसों की जोड़ी की तरह साथ-साथ ही गई है।

(जैसा तुम चाहो, रांगेय राघव, पृ. 29)

सेबेस्टियनः गनीमत है कि उसने विधवा डाडो ही कहा, विधुर इनीज नहीं कहा।

(वहीं, पृ. 63)

जूनो, विधवा डीडो, विधुर इनीज की क्या कथा है तथा यहाँ संवादों में इनका प्रयोग किस संदर्भ में किया गया है, यह पूर्णतः अस्पष्ट है। शेक्सपियर ने अपने नाटकों में प्राचीन कथाओं के संदर्भ भी पिरोए हैं। इस प्रकार के संदर्भ कथन को पुख़्ता बनाते हैं। अधिकांशतः संदर्भ या उद्धरण प्राचीन गाथाओं से लिए गए है-

डॉन पेड्रो- मेरा नकली चेहरा तो ठीक वैसा ही है जैसे फिलेमन और बॉसिस की झोपड़ी, में भगवान स्वयं आए थे।

(तिल का ताड़, रांगेय राघव, पृ. 32)

फिलेमन और बॉसिस स्त्री-पुरुष फ्रीजिया के ग़रीब किसान थे। वहाँ जूपीटर और मरकरी जो दूसरी जगहों से निकाल दिए गए थे, वेश बदलकर आए और उन दंपत्ति के स्वागत-सत्कार से प्रसन्न हो उसकी झोंपड़ी को मंदिर बना दिया। वहाँ वे एक पुजारी और पुजारिन के रूप में रहे।

शेक्सपियर के नाटकों में सूक्तियों के रूप में सौंदर्य यत्र-तत्र बिखरा पड़ा है। सूक्तियाँ जीवन का सार होती है। सूक्तियाँ अनुवाद का बेहतरीन उदाहरण हैं। मूलपाठ की रंगत तथा टोन इनके अनुवादों में पूरी तरह अभिव्यक्ति हुई हैं। कुछ उदाहरण द्रष्टव्य है-

A madman's epistles are no gospels
पागल की बात कर क्या विचार करना!

(बारहवीं रात, रांगेय राघव, पृ. 108)

There is a small choice is rotten apples.
सड़े हुए सेबों में पसंद करने की कम गुंजाइश होती है।

(परिवर्तन, रांगेय राघव, पृ. 25)

When the age is in, the wit is out
आयु हो साठ्या बुद्धि होय नाट्या।

(तिल का ताड़, रांगेय राघव, पृ. 81)

इस प्रकार उपरोक्त उदाहरणों के आधार पर कहा जा सकता है कि अनुवादकों ने कृति के प्रमाणिक अनुवाद के साथ ही प्रस्तुतिगत विशिष्टता का भी काफ़ी हद तक ध्यान रखा है। मूलभाषा की पदावली, मुहावरे, भंगिमाओं तथा टोन को लक्ष्यभाषा में उभारने का हर संभव प्रयत्न किया है और काफ़ी कुछ सफल भी हुए हैं। कई स्थलों पर अनुवाद को पढ़ते हुए मूल-रचना पढ़ने का सा अनुभव होता है। अनुवादक जहाँ कहीं भी मूलकृति से तादात्म्य स्थापित कर मूल कृति के विचारों, संवदेनाओं तथा अनुभूतियों को आत्मसात कर पाए, वहाँ उन्हें नए रूप में प्रस्तुत किया है। कई अनुवादकों ने व्यापाक आधार वाले ईसाई समाज की धार्मिक एवं सांप्रदायिक रूढ़ियों, सांस्कृतिक पहचान एवं परिवेश को अपने अनुवादों में जस का तस रखा है और पाद-टिप्पणियों के माध्यम से उनकी व्याख्या की है क्योंकि मूल के पदों का लक्ष्यभाषा में कोई अर्थ नहीं। ऐसे स्थलों पर अनुवाद "संस्कृति सेतु" का कार्य करते हुए दिखाई देते हैं। अनुवादों की भाषा के बारे में समग्र रूप से कहा जा सकता है कि मूल नाटक के पात्र समाज के विभिन्न वर्गों और तबकों यथा- ग्रामीण, शहरी, अनपढ़, गँवार, महिलाएँ, चापलूस, मसखरे तथा विभिन्न अंचल, धर्मो तथा विश्वासों से जुड़े पात्रों की भाषा, मुहावरे, व्यंग्य, हास-परिहास आदि का निर्वाह करने की भरपूर कोशिश दिखाई देती है और कई स्थलों पर अनुवाद ख़ूबसूरत बन पड़े है। शेक्सपियर केवल एक नाटककार नहीं बल्कि कवि भी थे और उनके नाटकों में उनकी कविताएँ बिखरी पड़ी हैं। हिंदी अनुवादकों ने कहीं भावानुवाद तो कहीं इन कविताओं का मात्र शब्दानुवाद कर काम चला लिया है। लेकिन जहाँ कहीं भी कविताओं के भावानुवाद किए गए हैं वहाँ शेक्सपियर के काव्य की अंतदृष्टि का पूर्ण संप्रेषण हुआ है। इन अनुवादों में कविता की लयात्मकता तथा संगीतात्मकता देखी जा सकती है। अनुवाद के दौरान कई स्थानों पर मूलपाठ के मुहावरों को अनुवादक पहचान नहीं पाया और ऐसी स्थिति में प्रयुक्त शब्दों को सामान्य शब्द समझकर सीधे अनुवाद करने की ग़लती भी कर बैठा है जिससे अर्थ का अनर्थ हो गया है। लेकिन अधिकांशतः अनुवादकों ने मूलभाषा प्रयुक्त शब्दावली, बिंब, मुहावरों, लोकोक्तियों तथा प्रतीकों को लक्ष्यभाषा के स्तर पर परख तथा पहचानकर उनका उचित प्रयोग किया है।

शेक्सपियर की भाषा का काव्यात्मक सौंदर्य बहुत हद तक इन हिन्दी अनुवादों में उतर गया है। अनुवादकों की भाषा ऐसे स्थलों पर केवल पाठपरक हीं नहीं बल्कि पूर्णतः मंचीय है। कुछ उदाहरण द्रष्टव्य है। शाइलॉक का संवाद प्रश्नोत्तर शैली का बेहतरीन उदाहरण हैं। जब सभी लोग उससे अपने कज़र्दार के प्रति दया दिखाने का आग्रह करते हैं तो वह कहता है –

"परमात्मा के किस न्याय से भयभीत होऊँ मैं? मैंने क्या पाप किया हैं? तुममें से कितनों ही ने गुलाम खरीद रखे हैं। और तुम उनसे नीचे से नीचे दर्ज़े का काम भी लेते हो। तुम उन्हें अपने गधों, कुत्तों और खच्चरों की तरह गुलामी के कारण काम में लाते हो। क्यों? सिर्फ इसलिए कि तुमने उन्हें ख़रीदा है। क्या मैं कहूँ कि तुम उन्हें छोड़ दो? उन्हें आज़ाद कर दो? अपना उत्तराधिकारियों से उनका विवाह कर दो? तुम्हारे बोझों के नीचे उनका पसीना क्यों बहे? क्यों न उनके बिस्तर भी तुम्हारे बिस्तरों के तरह गुदगुदे और मुलायम हों? तुम्हारे स्वादिष्ट भोजनों से उनके भी हलक़ तर क्यों नहीं रहे? तुम कहोगे- गुलाम हमारे है।"

(दुर्लभ बंधु, भारतेन्दु हरिश्चंद्र, पृ. 518)

शेक्सपियर की कॉमेडी की यह विशेषता है कि उसमें हास्य-व्यंग्यपूर्ण स्थलों की कोई कमी नहीं है। इस शैली का प्रयोग अनपेक्षित, बेतुकापन, कुरूपता, विरोध, असंगति या असंबद्धता के चित्रण के लिए किया जाता है। समाज के नामी-गिरामी व्यक्तियों की तुच्छ एवं महत्त्वहीन त्रुटियाँ व्यंग्य का निशाना बनती हैं। यहाँ हास्य में द्वेष का भाव मुख्य होता है। अवगुणों का चित्रण आनन्द के लिए किया जाता है। ग्रेशियानो के बातूनीपन का मज़ाक़ उड़ाते हुए व्यंग्यपूर्णशैली में कहता है कि-

"जितना ज्यादा ग्रेशियानो बोल सकता है, वेनिस में तो इसकी टक्कर को कोई है नहीं। पूरी दो भूसे की ढेरियों में सिर्फ़ दो दाने गेहूँ के मिल जाएँ तो भी बहुत समझो। पूरा दिन आप इसी में बरबाद कर दीजिए कि आख़िर इतना बोल रहा है, उसमें कुछ अक्ल की भी कहता है, तो मजाल है कि ढूँढ़े से भी मिल जाए?"

(वेनिस का सौदागर, रांगेय राघव, पृ. 147)

शेक्सपियर एक नाटककार होने के साथ ही एक उच्चकोटि के कवि भी थे। उन्होंने अपने नाटकों में कई स्थानों पर कविताओं का भी प्रयोग किया है। कई नाटकों में उन्होंने संवादों में काव्यात्मक शैली का प्रयोग किया है। ऐसी ही प्रभावी शैली से काव्यात्मक वातावरण का सृजन होता है। ऐसा नाटक जहाँ सुरम्य वातावरण हो, जादू-मंत्र हो, परियाँ हो, अदृश्य शक्तियाँ हो वहाँ सपाट गद्यात्मक शैली की अपेक्षा काव्यात्मक शैली अधिक उपयुक्त होती है। अपने दो नाटकों मिडसमर नाइट्स ड्रीम तथा द टेम्पेस्ट में शेक्सपियर ने नाटक को काव्यात्मक रूप दिया है। कविता तथा संगीत संपूर्ण नाटक के वातावरण में महसूस किए जा सकते हैं। काव्यात्मक शैली का प्रयोग संपूर्ण नाटक में देखा जा सकता है-

"मैं तेरे संग आऊँगी, नर्क को स्वर्ग मैं बनाऊँगी
प्रियतम के हाथों से सुख से मर जाऊँगी।"

(फागुन मेला, रघुवीर सहाय, पृ. 252)

भारतेन्दु जैसा महान व्यक्तित्व जब नाटक का अनुवाद करता है तो अपने साथ एक विशाल परम्परा भी लाता है। यहाँ अनूदित नाटक को प्रेक्षकों के अनुरूप बनाने की कोशिश की जाती है क्योंकि उन्होंने ऐसा पुस्तकों में पढ़ा है। शेक्सपियर के नाटक कई स्तरों तथा दिशाओं में चलते हैं। कथावस्तु की बहुस्तरीयता को ध्यान में रखते हुए, उसी के अनुरूप भाषिक ताने-बाने में उसे बुना गया है। योरोपीय परम्परा में शेक्सपियर के नाटक ग्रीक और रोमन भाषिक परम्परा से समृद्ध हुई तो भारत में पारसी रंगमंच ने इन्हें जनता तक सबसे पहले उर्दू-मिश्रित भाषा में पहुँचाया। यहाँ नाटक एक खाख़ास सांस्कृतिक सीमा में बँध कर रह गए हैं। शेक्सपियर के नाटकों में पाई जाने वाली बहुभाषिकता, बहुसांस्कृतिकता, बहुलतावादी दृष्टिकोण, बहुस्तरीय-समाज, संस्कृति, मिथक, आख्यान, विश्वास, स्थानीयता - ये सारी चीज़ें अनुवादों में सफलतापूर्वक लाना दुरूह कार्य है।

ऐसा नहीं है कि जिन अनुवादकों ने अनुवाद किया है वे कम पढ़े-लिखे हैं या उनकी दक्षता और क्षमता में कोई कमी हो। लेकिन शेक्सपियर की जो समृद्ध रंग-परम्परा है, जिस प्रकार की भव्यता उनके नाटकों में दिखाई देती है, वह अकल्पनीय है। वास्तव में शेक्सपियर जैसा प्रतिभा का धनी व्यक्ति सदियों में एक होता है। उसकी रचनाओं को उतार पाना सम्भव नहीं। वह कवि, नाटककार तथा रंगचेता भी है। उसे पता है कि कौन-कौन से तथ्य या घटक इसे उजागर करने में प्रभावी होंगे। कथ्य, कथोपकथन, पात्रों का अंतर्द्वद्व, सांस्कृतिक अंतरण-इन स्तरों पर हमारे अनुवादकों को कहीं-कहीं बहुत अधिक सफलता नहीं मिली है। शेक्सपियर के मूल नाटक को पढ़कर उसकी अर्थगर्भिता, सांस्कृतिक संकेत आदि को समझ पाना किसी आम या साधारण पाठक के लिए बहुत कठित है। जहाँ कहीं इस तरह के वाक्य, पद-संरचना, मुहावरे, द्विअर्थी संवाद और अन्विति को पाठ-सामग्री की दृष्टि से या रंगमंचीय आग्रह के चलते अनूदित, रूपान्तरित या उसके आशय को विकसित करने की कोशिश की गई है तो वहाँ अनुवादकों, रूपांतरकारों या निर्माताओं (नाटक, फ़िल्म, टी.वी. धारावाहिक आदि) को न केवल चुनौती का सामना करना पड़ा है बल्कि एक सीमा तक ही वे सफल हो पाए हैं। इसका महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि हमारी नाट्य परम्परा या रंग परम्परा (लेखन और प्रस्तुतीकरण) दोनों ही अभी भी अपनी किशोरावस्था में है और प्रयोगरत हैं।

अपनी तमाम तैयारी के बावजूद शेक्सपियर के हिन्दी अनुवादक किसी साहित्यिक पाठ को रंगकर्म की आकांक्षाओं के अनुरूप निर्मित नहीं कर पाए हैं। अपनी रचनात्मक संवेदना में निश्चित ही वे मूल पाठ की गम्भीरता एवं संदेश को लक्ष्यभाषा में अंतरित करना चाहते हैं परन्तु हिन्दी भाषा की आंतरिक एवं बाह्य संरचना मूलपाठ के साथ कई अवसरों पर न्याय नहीं कर पाती। शेक्सपियर के कई नाटक हिन्दी में अनूदित हैं लेकिन जब तक पूरी गम्भीरता के साथ अनूदित पाठों को उसकी समग्रता में पठन-पाठन एवं मंचन-दोनों ही दृष्टियों से सुसंपादित और अभिनेय बनाए जाने का प्रयत्न नहीं किया जाएगा तब तक हम शेक्सपियर के साथ न्याय नहीं कर पाएँगे।

सन्दर्भ

1. Complete Work of William Shakespeare, New Delhi : Oxford and IBH Publishing, 2005
2. Wells, Stanley and Garry Taylor (eds.), William Shakespeare – The Complete Work, Oxford : Clarendon Press, 1986
3. शेक्सपियर कॉमेडी, एच.बी. चार्लटन, मेथ्युन एंड को., ब्रिटेन, 1961
4. रंगमंच और नाटक की भूमिका, डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल, नेशनल पब्लिशिंग हाऊस, दिल्ली, 1965
5. मानविकी पारिभाषिक कोश – डॉ. नगेन्द्र, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1965
6. हरिश्चन्द्र भारतेन्दु, दुर्लभ बन्धु या वंशपुर का महाजन (The Merchant of Venice)] भारतेन्दु समग्र, वाराणसी, 2006
7- राघव रांगेय, जैसा तुम चाहो (As you like it), दिल्ली: राजपाल एण्ड संस, 2006
8. तिल का ताड़ (Much ado about Nothing), दिल्ली: राजपाल एण्ड संस, 2006
9. परिवर्तन (The Taming of The Shrew), दिल्ली: राजपाल एण्ड संस, 2006
10. बारहवीं रात (Twelfth Night), दिल्ली: राजपाल एण्ड संस, 2006
11. भूलभुलैया (Comedy of Errors), दिल्ली: राजपाल एण्ड संस, 2006
12. वेनिस का सौदागर (The Merchant of Venice), रांगेय राघव, दिल्ली: राजपाल एण्ड संस, 2006
13- सहाय रघुवीर, फागुन मेला (A Midsummer Night's Dream), रघुवीर सहाय रचनावली, भाग-6, दिल्ली: राजकमल प्रकाशन, 1983


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