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ISSN 2292-9754

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02.21.2017


कॉमेडी के निकष पर शेक्सपियर

नाटकों में कॉमेडी की अवधारणा का आरंभ प्राचीन ग्रीक अथवा एट्टिक कॉमेडी से माना जाता है जिसका स्रोत हर्षोल्लास एवं मदिरा के देवता डायोनिसस से संबंधित पर्व है। कॉमेडी के लिए यूनानी (ग्रीक) शब्द "कोमोडिया" है जिसका मूल रूप है "कोमोस"। इसका अर्थ है "डायोनिसस की शोभायात्रा में नाच-गाना, हास्य-परिहास, अभद्र चुटकुले, आक्षेप और कटाक्ष"। यूनानी चिंतक अरस्तू का मानना है कि कॉमेडी का उत्सव एथेंस में मनाया जाने वाला डायोनिसस पर्व का जुलूस है, जिसमें "एक विशाल लिंग के साथ चलने वाले और इसे देखने के लिए एकत्रित हुए लोगों के बीच हँसी-मज़ाक और अमर्यादित टिप्पणियाँ" की जाती हैं। कुछ लोगों का यह मानना है कि कॉमेडी का आरंभ - "मेगारा के हास्यप्रिय लोगों ने परंपरागत चुटकुलों को एक व्यवस्थित रूप देकर किया। यह प्रक्रिया कब प्रारंभ हुई, कैसे विकसित हुई और कैसे इसने एक निश्चित रूप प्राप्त किया, यह कहना कठिन है। संभवतः यह विधा त्रासदी से कहीं ज़्यादा पुरानी है। मेगारा से यह तथाकथित प्रहसन दूसरी डोरिक बोलने वाली जातियों और प्रजातियों में पहुँचा।" कॉमेडी की परंपरा त्रासदी से प्राचीन है लेकिन जब तक राज्य द्वारा संरक्षण तथा प्रतियोगिताओं का आयोजन नहीं हुआ तब तक इसकी न तो कोई पहचान बनी और न ही लोकप्रियता हासिल हुई।

क्लासिकल ग्रीक कॉमेडी के विकास को तीन चरणों में देखा जा सकता है- "प्राचीन कॉमेडी" जिसकी चरमोन्नति एट्टिका में पाँचवीं शताब्दी ई.पू. में हुई - "मध्ययुगीन कॉमेडी" जिसका समय 400-323 ई.पू. माना जाता है तथा "नई कॉमेडी" जो 323-226 ई.पू. के दौरान लिखी और प्रस्तुत की गई। उस समय के कॉमेडी में एथेंस के जनजीवन का खुला चित्रण दिखाई देता है। इसका उद्देश्य मात्र जनता को हँसाना ही नहीं था बल्कि इसके माध्यम से हर उस चीज़ की आलोचना की जाती जो श्रेय नहीं थी। "रोमन कॉमेडी" ग्रीक कॉमेडी के ही आधार पर लिखे गए। "नाट्य का यह रूप त्रासदी की अपेक्षा कहीं अधिक जीवन का परिचायक और उसका प्रतिनिधि स्वरूप है" क्योंकि इनमें रोम के सामाजिक, राजनैतिक तथा पारिवारिक जीवन का व्यापक चित्रण किया जाता रहा। ये नाटक रोमन समाज का आईना हैं जो उस समय की आशाओं, आकांक्षाओं, सफलता तथा विफलता को प्रतिबिंबित करती हैं। इसके उदय का मुख्य कारण नवयुवकों में शिक्षा तथा संस्कार को जगाना था ताकि वे एक ज़िम्मेवार नागरिक बन सकें तथा समाज की नींव मज़बूत हो सके। टेरेंस और प्लॉटस रोम के प्रमुख कॉमेडी लेखक हैं। भले ही इन नाटककारों का कोई महत्वपूर्ण स्थान न रहा हो परन्तु आने वाले समय में यूरोप के नाटककारों ने इन्हीं को अपना आदर्श माना। स्वयं शेक्सपियर ने कई कॉमेडी की रचना प्लॉट्स और टेरेंस के आधार पर किए।

कॉमेडी तथा हास्य में गहरा संबंध है। लेकिन सवाल यह उठता है कि वे कौन-से कारण हैं जिनसे हास्य की सृष्टि होती है? इनमें सबसे पहला है- मनुष्य का शारीरिक आकार-प्रकार, विकृति या कुरूपता, बेढंगी हरकत और अटपटी चाल, अजीबोग़रीब पोशाक, वेशभूषा आदि जो हास्य की स्थिति पैदा करते हैं। शेक्सपियर के नाटक में विकृत, कुरूप तथा वीभत्स शरीर वाले कैलीबान, घड़े-जैसा पेट वाला फॉल्स्टाफ, लंबाई-चौड़ाई में एक समान गोल-मटोल नेल, कंकालरूपी डॉ. पिंच आदि को देखकर प्रेक्षक हँसी रोक नहीं पाते। दूसरा कारण है पात्रों द्वारा भाषा का ग़लत या अटपटा प्रयोग जो हास्य उत्पन्न करता है। शेक्सपियर के पात्र लॉस लॉट गोब्बो, हार्लोफर्नीज या बॉटम ग़लत अथवा अनोखी भाषा-प्रयोगों के कारण हास्य की सृष्टि करते हैं। तीसरा कारण है- जीवन की वे मज़ेदार तथा हास्यास्पद परिस्थतियाँ जो शेक्सपियर की कॉमेडी में भरी पड़ी हैं। जब हम, लड़के के वेश में वॉयला को ड्यूक ऑरसीनों की ओर से ऑलीविया के प्रति प्रेम प्रकट करते पाते हैं, कायर एग्यूचीक को उसे द्वंद्व की चुनौती देते देखते हैं, फीबी का पुरुष वेश रोज़ालिंड के प्रेम में पागल होना, कैथरीना का पेत्रुचियो द्वारा वश में किया जाना, लॉगविले, बैरोने, ड्यमेन और सम्राट फर्डिनेंड का प्रेम में न पड़ने की क़सम उठाना और उन्हीं का प्रेम में पागल हो जाना आदि ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं कि दर्शक हँसे बिना नहीं रह सकता। अनपेक्षित चारित्रिक विशिष्टताएँ परिस्थितियों और प्रसंग सबसे अधिक हास्य उत्पन्न करते हैं। शेक्सपियर की कॉमेडी में ऐसे चरित्र, परिस्थितियाँ तथा प्रसंगों की कमी नहीं है। वास्तव में अप्रत्याशित या अनपेक्षित से ही कॉमेडी की उपयुक्त स्थिति का जन्म होता है। स्टीफेनो-ट्रिंक्यूलो-कैलीबान प्रसंग, ड्रोमियो-एण्टीफोलस प्रसंग, गैनीमीड-फीबी प्रसंग, बैरोने और उसके साथियों के प्रेम प्रसंग तथा टचस्टोन-कोस्टार्ड आदि चरित्र हास्य की सृष्टि करते हैं। इस प्रकार हम कभी पात्रों की आकृति तथा पोशाक, कभी आचरण की विसंगति तो कभी अनौचित्य के प्रदर्शन पर हँसते हैं। वास्तव में प्रेक्षक ऐसी परिस्थितियों में आनंदित इसलिए होते हैं क्योंकि वे समझते हैं कि उन मूर्ख पात्रों की तुलना में वे अधिक समझदार, शालीन तथा सुसंस्कृत हैं। ऐसी बेवकूफ़ी वे कर ही नहीं सकते। इसके अलावा कुछ लोगों का मानना है कि ऐसी स्थिति में हमारी भावनाओं का रेचन होता है, अवरुद्ध भावों को प्रकट होने का अवसर प्राप्त होता है। दर्शक कॉमेडी के पात्रों की त्रुटियों तथा दोषों से स्वयं सीखता है। वास्तव में हम जो कुछ हैं और हमें जो कुछ होना चाहिए, कॉमेडी में इसके बीच के अंतर से अवगत कराती है जिसमें हम देखते हैं, समझते हैं, उस पर हँसते हैं और उसका सुधार करते हैं।

जूलियर सीज़र के विजय के बाद रोमनों द्वारा इंग्लैंड में नाटक का प्रारम्भ हुआ। इनके इंग्लैंड छोड़ने के साथ ही उनके द्वारा स्थापित नाट्यशालाओं का भी अंत हो गया। इसके बाद भाट, गायक, विदूषक, भांड आदि घूम-घूमकर नाटकीय प्रदर्शनों द्वारा जनता का मनोरंजन करते। जो चर्च बराबर नाट्य प्रदर्शनों का विरोध करता था वही कालांतर में रंगमंचीय अभिनय का आधार बना। जनता की बढ़ती रुचि के कारण नाटक इसके प्रचार का माध्यम बने तथा विशेष अवसरों पर नाट्य प्रदर्शन का चलन प्रारंभ हुआ।

एलिज़ाबेथकालीन दर्शक जीवन-जगत के प्रति परम उत्साही तथा प्रत्यक्ष रुचि लेने वाले लोग थे। शेक्सपियर का युग बौद्धिक और भावात्मक विकास की एक चरम सीमा का युग था। भाषा, काव्य, संगीत, राजनीति, समाज, व्यापार, नृत्य आदि सभी क्षेत्रों में उनकी रुचि थी। ईश्वर की सबसे अनुपम रचना के रूप में मनुष्य को इस युग में स्वीकार किया था तथा उसमें पूर्ण आस्था व्यक्त की। एलिज़ाबेथकालीन रंगमंच इसी युग-चेतना और सौंदर्यबोध का दर्पण है। प्रेम, अंधविश्वास, अविश्वास, महत्वकांक्षा, स्वार्थ, घृणा अहंकार इन सभी महत्वपूर्ण प्रश्नों को जीवन में उस युग ने देखना-समझना चाहा था। शेक्सपियर ने अपने रंगमंच में युग के इसी भाव-बोध को वाणी दी है। अँग्रेज़ी रंगमंच का सबसे समृद्धपूर्ण एलिज़ाबेथ काल शेक्सपियर का काल था। समाज के सभी वर्गों के लोग नाटकों के शौकीन थे। ये दर्शक काल्पनिक विचारों वाले थे जो चरित्रों और उनके संवादों पर ज़्यादा ध्यान देते थे। लड़ाई-झगड़ा, युद्ध, मार-काट में दर्शक ज़्यादा आनंद लेते थे। तड़क-भड़क के दृश्यों को लोग अधिक चाव से देखते थे। अतः इन दृश्यों के अनुकूल तैयारी के लिए क़ीमती और भड़कीले कपड़ों को पहनना अभिनेताओं के लिए आवश्यक होता था।

सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में जब इंग्लैंड की जनता की रुचि नाटकों में बढ़ रही थी, नए-नए नाटककार तथा नाट्यशालाएँ उभरकर सामने आ रहे थे उस समय एक महान कलाकार का जन्म हुआ, जिसका नाम था विलियम शेक्सपियर। इन्हें "अपनी नाटकीय प्रतिभा को विकसित करने का अवसर अपने युग के रंगमंच, अभिनेता, लेखक, निर्देशक आदि के रूप में संबंधित होने से मिला था।" लीली, कीड और मार्लो का प्रभाव शेक्सपियर के प्रारंभिक नाटकों पर देखा जा सकता है लेकिन उससे भी ज़्यादा रंगमंच के अनुशासन का प्रभाव पड़ा है।

शेक्सपियर का नाम कॉमेडी को मौलिक रूप तथा नवीन दृष्टि प्रदान करने के लिए हमेशा लिया जाएगा। साहित्य को वास्तव में शेक्सपियर के रूप में एक ऐसा कलाकार मिला, जिसने इस युग की सामग्री का प्रचुर उपयोग किया।

उनकी प्रारम्भिक कॉमेडी आमोद-प्रमोद से पूर्ण और जीवन के सुनहले रंगों से सजी-धजी है। चारों ओर प्रसन्नता तथा ख़ुशहाली का वर्णन है। एलिज़ाबेथकालीन समाज का बेहतरीन चित्रण मिलता है। एक ओर यहाँ उच्च-भाव, वाक्-चातुर्य, शब्द-चातुर्य, तुकबंदी इत्यादि दिखाई देते हैं तो दूसरी ओर गीत-संगीत और हास-परिहास की अद्भुत छटा दिखाई देती है। इस युग का इतना मनमोहक चित्रण और कहीं दिखाई नहीं देता। अपनी इस प्रतिभा के कारण उन्हें अत्यंत लोकप्रियता मिली। एलिज़ाबेथकालीन कॉमेडी को शेक्सपियर की सर्वप्रमुख देन उसे एक रूप प्रदान करना था। इसके पहले कॉमेडी देहाती, अनगढ़ तथा अपरिष्कृत हुआ करती थी। जीवंत तो थी लेकिन उसमें कथावस्तु की कमी थी। वह बहुत कुछ परंपरागत नाटकों की तरह आकारविहीन थी।

शेक्सपियर या तो पहले से चली आ रही कथावस्तु को परिवर्तित कर रोमन नाटकों के आधार पर रचना करते रहे या फिर मध्ययुग द्वारा प्रदत्त सामग्री का प्रयोग कर नवीन नाटक शैली का निर्माण करते रहे। वे समय की नाड़ी को पहचानते थे। अपने अनुभवों द्वारा जान चुके थे कि इस नए युग में पुरानी पद्धति पर आधारित नाटकों की खपत नहीं हो सकेगी। जनरुचि बदल रही थी और वे इससे बेखख़बर न थे।

मंच पर हास्य वास्तव में, शेक्सपियर की "कॉमेडी" की पहचान हैं। उनकी कल्पना हमें छू जाती है। नाटकों में हास्य जॉनसन या मोलियर की ही तरह है परन्तु बौद्धिक स्तर पर वे संकुचित हैं तथा आकर्षित नहीं करते। इन्होंने एक से बढ़कर एक पात्र पाठकों को दिए। फॉलस्टाफ जैसे पात्र में अनेक चारित्रिक दुर्गुण हैं लेकिन प्रेक्षक उसे पसंद करते रहे हैं, उससे एक लगाव महसूस करते रहे हैं। शेक्सपियर के पात्र ऑथेलो और मैकबेथ से डॉगबेरी तक समरूप माने जा सकते हैं, हक़ीक़त है। वह एक दिन का जीव नहीं है जो दिन ढलने के साथ गुम हो जाएगा, बल्कि वह सत्य का प्रतिनिधि है और जो हमेशा के लिए सत्य ही रहेगा।

ऐसा नहीं है कि शेक्सपियर ने किसी सिद्धांत या नियमावली के अंतर्गत नाटक लिखना शुरू किया। उन्होंने अपने अनुभव, सूझ-बूझ तथा कल्पना शक्ति द्वारा एक ऐसे समाज का निर्माण अपनी कॉमेडी में किया जो मध्ययुगीन परिस्थिति के अनुरूप था। अपनी कल्पना द्वारा उन्होंने जिस कथावस्तु को चुना, जो पात्र निर्मित किए, जो वातावरण सजाया उसमें दैवी रूप से वास्तविक सुखांत की प्राण-प्रतिष्ठा होती गई। उनका सुखांतक जगत कल्पना तथा यथार्थ के अनुपम सामंजस्य द्वारा आविर्भूत है। शेक्सपियर की कॉमेडी की कथावस्तु के अंत मे हमें आनंद, सुख तथा संतोष की त्रिवेणी दिखाई देती है। कथावस्तु के चुनाव में उन्होंने अपनी कल्पना तथा बौद्धिक शक्ति का परिचय दिया। सर्वत्र हर्ष तथा संतोष की छाया प्रस्फुटित होती है। लेकिन कहीं भी इनके पात्र कठपुतली की तरह आचरण नहीं करते।

शेक्सपियर की कॉमेडी का संसार कल्पना का संसार न होकर लौकिक जगत है। परिवार तथा सामाजिक दिनचर्या इसकी पृष्ठभूमि में है। प्रेक्षक जीवन के राग-विराग, सुख-दुख, जय-पराजय सब शंकाओं के समाधान यहीं पाते हैं। अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए नाटककार सर्जना करता है। ऐसे जीवंत पात्रों को गढ़ने के लिए लोक-व्यवहार तथा सांसारिक अनुभव की आवश्यकता होती है। यह काम केवल वही कलाकार कर सकता है जिसने जीवन का सार अपने अनुभव की मथनी से मथ कर निकाला हो और मानवता पर जिसे अटूट विश्वास हो। मानव चरित्र की गहराईयों तक पहुंचने का केवल यही एक रास्ता है। शेक्सपियर ने इसे सफलतापूर्वक पार किया।

शेक्सपियर के इन नाटकों का एकमात्र उद्देश्य है- हास्य द्वारा समाज एवं जीवन के उल्लास, हर्ष तथा मोद से भरपूर चित्रण कर हमें आनन्दित करना। समाज-सुधार की बात किए बगैर वे समाज को उसका आईना पात्रों के माध्यम से दिखाते हैं। शेक्सपियर के सभी कॉमेडी रोमांचक हैं। उन्होंने रामेनों की कॉमेडी के बरक्स एक भिन्न प्रकार की कॉमेडी की सर्जना की। अपने नाटकों की पृष्ठभूमि में रोमन समाज को न रखकर एलिज़ाबेथकालीन अँग्रेज़ी समाज तथा उसके आचार-व्यवहार को रखा। रोमनों के षड्यंत्रपूर्ण, घटना-प्रधान कथावस्तु के स्थान पर पात्र-प्रधान कथावस्तु को अपनाया। दैनिक जीवन तथा स्वाभाविक आचार-विचार को व्यंग्य, उपहास तथा हास्य का आधार बनाया न कि षड्यंत्र या समाज सुधार द्वारा नाटकीय उद्देश्य की पूर्ति की।

शेक्सपियर के सभी कॉमेडी का प्रमुख विषय प्रेम है। एक और कारण जिसकी तहत इनके नाटकों को रोमांटिक माना जाता है। पारंपरिक रोमांस के अलावा प्रेम अपने विभिन्न रूप में नाटकों में दिखाई देता है- कहीं प्रतिदान तो कहीं प्रतिशोध के रूप में, कहीं यह पूर्ण रूप को प्राप्त है तो कहीं और कहीं ग़लत आंका गया है। कहीं प्रतियोगी के रूप में, तो कहीं कष्टों तथा दुर्भाग्य से घिरा है तो कहीं शक्ति तथा मित्रता के प्रतिस्पर्धी रूप में सामने आया है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि एक ही भाव के कितने सारे रूपों की कल्पना की जा सकती है। उसे केन्द्र में रखकर कितने प्लॉट गढ़े तथा कितने पात्र खड़े किए जा सकते हैं। यह लेखक के जीवन अनुभव, उसे सीखने की ललक तथा उसे संजोने एवं शब्दों में उतारने की कला को दर्शाता है। जहाँ तक एक पाठक की सोच जा सकती है, उसकी कल्पना उड़ान भर सकती है उससे कहीं अधिक किसी व्यक्ति या विषय से संबंधित संदर्भ शेक्सपियर देते हैं। शेक्सपियर की प्रतिभा का एक अन्य बिन्दु उसके द्वारा किया गया यथार्थवादी चित्रण है। वह जिस प्रकार से निम्नवर्ग के व्यक्तियों का चित्रण करता है, उन पर किए गए व्यंग्य, हास्यास्पद शब्द-प्रयोग, उनकी भूल-चूक, ग़लतियाँ इत्यादि को दिखाता है इससे उसका चित्रण यथार्थवादी हो जाता है।

शेक्सपियर ने अपनी प्रतिभा से, प्राचीन कॉमेडी से अलग हमें एक ऐसी कॉमेडी दी जहाँ हास्य तथा रोमांस समन्वित रूप में देखने को मिलता है। यह विश्व साहित्य में अपना सहज सानी नहीं रखता। इनकी कॉमेडी में प्रणय का उन्नयन दिखाई देता है जो साहित्य का प्राण है। कॉमेडी में कथा का ढांचा महत्वपूर्ण है। मुख्य कथा में एक या दो प्रणय कथाएँ होती हैं जो हमें सपनों की दुनिया में ले जाती हैं जहाँ प्रेम, संगीत, हास-परिहास, हँसी-मज़ाक, रूठना और मनाना, ग़लतफ़हमियाँ हैं। इसके साथ ही साथ संघर्ष तथा कठिनाइयाँ भी हैं जिनके बाद ही प्रेमी और प्रेमिका का मिलन होता है और नाटक का सुखद अंत भी। उनकी कॉमेडी का मूल तत्व पात्रों के बुद्धि-संघर्ष, हास्यास्पद बातें तथा स्थितियाँ, वाक्चातुर्य से भरे संवादों में रहता है। शेक्सपियर का अपनी कॉमेडी में उतना ध्यान नहीं रहता जितना वातावरण की रूमानियत तथा चरित्रों के बांकपन पर। अक्सर उनके नायक "जंगल में मंगल" मनाते हुए दिखाई देते हैं- ईलीरिया, एथेंस, आर्डेन, बेलमॉण्ट दुनिया से दूर, जादुई, अद्भुत देशों तथा अनोखे द्वीपों का चित्रण मिलता है। ये सभी स्थल सपनों की दुनिया जैसे लगते हैं परन्तु उनके संघर्ष मुसीबतों तथा कठिनाईयाँ इसी लोक की हैं। पात्रों को प्रकृति अपने गोद में शरण देती है जो कुचक्रों या कलह के कारण घर-बार से बेदख़ल कर दिए गए हैं या दुर्देव के शिकार हैं। अपने पूर्ववर्ती नाटककारों की लेखन परंपरा को शेक्सपियर ने और बढ़ाया, सजाया तथा संवारा है। रोमांस की स्वप्निल छाया शेक्सपियर की कॉमेडी में आरंभ से अंत तक दिखाई देती है- लोक-परंपरा तथा स्थानीय रंगत लिए राग-रंग की गोष्ठियाँ अधिकांशतः प्रकृति की छांह में आयोजित की जाती है।

शेक्सपियर को "पात्रों का जन्मदाता" के रूप में जाना जाता है। चरित्र सर्जना में इन्हें महारथ हासिल थी। जॉनसन भी अपने पात्रों के लिए जाने जाते हैं। लेकिन दुनिया का कोई भी रचनाकार ऐसा नहीं है जो इतने सारे पात्रों के जीवन चित्रण के लिए जाना होता हो। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र, प्रत्येक कोने से इन्होंने पात्रों को उठाया और उनमें जान फूँक दी। किसी भी लेखक की दृष्टि इतनी पैनी नहीं कि वह प्रत्येक पात्र की मनःस्थिति, उसकी भाषा, आचार-विचार आदि का इतना सूक्ष्म तथा सार्थक चित्रण कर सके जितना कि शेक्सपियर की कृतियों में मिलता है। इनके पात्र साधारण, मूर्ख, कमअक्ल, मज़ाकिया व्यक्ति से लेकर धीर-गंभीर प्रकृति तक हैं। किसी भी लेखक ने इतने जीवंत तथा यादगार पात्रों का निर्माण नहीं किया और यही उनकी सर्वोत्तम उपलब्धि है। अपने भावों को शेक्सपीयर ने अत्यंत चमत्कारिक भाषा में अद्भुत प्रवीणता के साथ प्रस्तुत किया है। उनकी भाषा अत्यन्त भव्य थी। एक कुशल अभिनेता की सी स्मरणशक्ति के कारण उन्होंने समाज के हर तबके के शब्द तथा मुहावरों को सीखा तथा अपनी सजगता के कारण जहाँ कहीं भी संभव हो सका उसका अपने नाटकों में प्रयोग किया। यह अँग्रेज़ी नाटक को उनकी विशिष्ट देन है। शेक्सपियर की कॉमेडी का महत्व, उनकी नायिकाओं के कारण भी है। त्रासदी के नायक भले पुरुष हो लेकिन, कॉमेडी की जान तो स्त्रियाँ हैं। आनेवाले समय में महिला पात्रों के लिए ज़मीन सही मायनों में शेक्सपियर ही तैयार करते हैं।

शेक्सपियर की कॉमेडी में एक ओर जहाँ दरबारी जीवन से जुड़े षड्यंत्र और मक्कारियों का चित्रण है वहीं दूसरी ओर पशुचारिक संस्कृति से भी वे अछूती नहीं। इन नाटकों में संगीत की लय बहती है तथा वाक्पटुता से हृदय जीवंत हो उठता है। जीवन के प्रति स्वप्निल दृष्टि नाट्यकृति को सम्पूर्ण और उल्लासपूर्ण बनाती हैं। समग्रतः कहा जा सकता है कि प्रसन्न रहने के लिए मानवीय अधिकार का उद्घोष हैं शेक्सपियर की कॉमेडी "दूसरों की खुशी में ख़ुश न रह पाने की संकुचित वृत्ति यहाँ महापाप है। मूढ़ और परोपजीवी बर्दाश्त कर लिए जाते हैं लेकिन छोटे दिल के लोग नहीं।"

भूलभुलैया शुद्ध रूप से एक प्रहसन है जिसे सन् 1594 ई. में क्रिसमस के अवसर पर "ग्रे इन में खेला गया था।" परिवर्तन भी प्रहसन है लेकिन इसका अंत रहस्यपूर्ण तथा गंभीर है। यह एलिज़ाबेथकालीन विचारों को ध्यान में रखकर लिखा गया था। "वेनिस का व्यवसायी" नाटक का कुछ हिस्सा त्रासदी के क़रीब है। हालाँकि एलिज़ाबेथकालीन दर्शक इस नाटक में शाईलॉक को हास्यास्पद पात्र के रूप में देखते हैं लेकिन उसके चरित्र में त्रासदी के अंश भी हैं। शेक्सपियर का दृष्टिकोण उभयवाची है। जैसा कि अक्सर होता है वे अपना दृष्टिकोण पाठक या दर्शकों पर थोपते नहीं हैं बल्कि केवल अपना पक्ष रखते हैं तथा पाठकों के स्वयं सोचने, समझने के लिए विषय को खुला छोड़ देते हैं। "जैसा तुम चाहो" अन्य नाटकों की तुलना में बिल्कुल अलग है। यह रोमांस से भरपूर ग्रामीण नाटक है जिसमें नाटककार ने पशुचारी संस्कृति का चित्रण किया है। इस नाटक की रचना में शेक्सपियर ने लॉज कृत "रोज़ालिंड" नामक ग्रामीण उपन्यास की सहायता ली है लेकिन नाटक में अपनी कल्पना के रंग भरे हैं। यहाँ अदन के घने जंगलों का चित्रण है जहाँ लेखक के निजी जीवन तथा आत्मकथा की छाप दिखाई देती है। ज़्यादातर नाटकों की कथावस्तु का स्रोत इटली के नाटक हैं और पात्रों तथा स्थानों के नाम में इटली की रंगत दिखाई पड़ती है लेकिन फिर भी ये अपने मूल में अँग्रेज़ी ही है। इन नाटकों में वर्णित समाज मूलतः एलिज़ाबेथकालीन इंग्लैंड है। व्यापारियों द्वारा बंदरगाह से माल लाना, ले जाना, व्यापार या आवागमन में क्षति या ज़ोख़िम, शाम की चहल-पहल, प्रीति भोज, नाच-गान, नाटक, उत्सव आदि सब पर अँग्रेज़ी समाज की छाप है। "बारहवीं रात" आख़िरी रोमांटिक नाटक है जिसमें संगीत तथा विषादपूर्ण स्थिति का मिला-जुला रूप दिखाई देता है। एक बार फिर यहाँ उसी अनोखे नाटककार, शेक्सपियर का जादू चलता है। प्रेम के गंभीर कथ्य के साथ रंग-वस्तु निर्माण फिर एक बार अभिन्न ढंग से किया जाता है। इसके विभिन्न रूप-छल, निराशा, ग़लतफ़हमी आदि जो अपने यथार्थ रूप में आए हैं। सर टोबी वेल्च की बेवकूफ़ी और मालवोलियों की सादगी, जिसके कारण वह मूर्ख बनता है, नाटक में हास्यास्पद स्थिति पैदा करतीं हैं। जैसा तुम चाहो की नायिका वायोला अधिकांश समय लड़के रूप में रंगमंच पर आती है। स्त्री द्वारा पुरुष के छद्मरूप को धारण करना उस समय के नाटकों की एक विशेषता थी। शेक्सपियर के कई नाटकों में इस प्रकार की अदला-बदली देखी गई है। जिस प्रकार से बारहवीं रात में प्रेम का विषादमयी अंत होता है उसे देखकर ऐसा आभास होता है जैसे कुछ ख़त्म हो रहा हो और निःसंदेह इसी के साथ शेक्सपियर की विशिष्ट छाप वाली रोमांटिक कॉमेडी का सुनहला दौर समाप्त हुआ।

सन्दर्भ

1. Complete Work of William Shakespeare, New Delhi : Oxford and IBH Publishing, 2005
2. Wells, Stanley and Garry Taylor (eds.), William Shakespeare – The Complete Work, Oxford : Clarendon Press, 1986
3. शेक्सपियर कॉमेडी, एच.बी. चार्लटन, मेथ्युन एंड को., ब्रिटेन, 1961
4. रंगमंच और नाटक की भूमिका, डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल, नेशनल पब्लिशिंग हाऊस, दिल्ली, 1965
5. मानविकी पारिभाषिक कोश - डॉ. नगेन्द्र, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1965
6. ग्रीक नाट्य कला कोश - डॉ. कमल नसीम, राष्ट्रीय नाटय विद्यालय, नई दिल्ली,


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