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ISSN 2292-9754

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04.02.2018


 ब्रूनो की बेटियाँ

........क्यूँकि हम हैं
ब्रुनो की बेटियाँ।
आजकल ब्रह्मा ने भी कर दी है
अनसुनी मानसपुत्र नारद की पुकार
और
तल्लीनतापूर्वक सुनते हैं
ब्रुनो की बेटियों की बात॥

सत्य एक दिन
आ खड़ा होता है
सबके सामने प्रत्यक्ष
जीवन के सर्वाधिक
अप्रत्याशित क्षणो में।
झूठ की घुमावदार गलियाँ भी
कर नहीं पाती दिग्भ्रमित उसे
बहुत देर तक॥
उदीयमान सूर्य की
लालिमा को ढँक तो सकते हैं
मिलकर, एकजुट सारे मेघ
पर –
क्या कभी झेल सकते हैं
उसके प्रखर, प्रचंड ताप को?
फिर भला –
मोम के पुतलों की
औक़ात हीं क्या?
उसे तो पिघलना हीं है
एक न एक दिन
कहा था ब्रूनों ने
अपनी बेटियों से
उस दिन॥
किसी के रहने न रहने से
दुनियाँ नहीं थमती
शाश्वत है तो बस एक –
समय सत्य॥
भूल गए महान राजा
ओजीमेंडियस को –
सदियों बाद मिली मूर्ति जिसकी
तुछ रेत के साए में लिपटी
अंग प्रत्यंग सही सलामत।
कुछ नहीं थी अगर -
तो वह थी
नाक।
किसी मेहनतकश ने
सदियों बाद एक ही वार में
तोड़ डाली थी उसकी नाक॥
महान राजा का
ऐसा कारुणिक अंत?
क्या था यह?
महाभिनिष्क्रमण
या
समयचक्र परिवर्तन?

नाक??
हाँ, नाक ही तो थी वह
जिसने रचा
रामायण –महाभारत
प्रत्यक्ष या परोक्ष
सदी दर सदी
हर बार॥
कुछ बदलता रहा
तो वह है समय
और,
हम हैं उसी सत्य की आवाज़ –
हम हैं ब्रुनो की बेटियाँ॥

आख़िर कौन है ये ब्रुनो जिसकी
बेटियाँ हो तुम?
क्या है परिचय तुम्हारा?
किस खानदान, खून, नस्ल
की हो तुम?
क्या-
है कोई संबंध तुम्हारा उससे
जो है आज अमीर–उमराव?
वेश–भूषा तो फिर भी ठीक
चाल–चलन??!!
ख़ैर-
लेकिन कुछ तो गड़बड़ है
तुम्हारे साथ
जो होने नहीं देता तुम्हें हम सा
मुकम्मल एकसार॥

अरे! हाँ!!
ये सोच! उफ़्फ़!!
तुम्हारी ये सोंच!?
हाँ,हाँ, हाँ तुमहार ये सोंच!!
कोफ़्त होती है हमें इससे
और ये ही लगता है
तुम्हारी परवरिश पर
प्रश्नचिन्ह॥
तुम्हारी ज़बान !!
हाँ, ये ज़बान जो चलती है
कतरनी की तरह
और-
तुम्हारे सवालातों के जंगलात
बनने नहीं देता तुम्हें सामाजिक
ताकि
बैठ सको हमारे बीच
जो हैं सभ्य संभ्रांत
कर सको मधुर संभाषण॥
और सबसे बड़ी बात –
बात बनने की कला में कच्ची
हो नहीं सकती हम सरीखी कलावंत॥
ऊपर से
हो निहायत हीं
बदतमीज़, बेपरवाह, बेलौस
अक्खड़, घमंडी
और –
अकड़
उफ़्फ़!! तुम्हारी ये अक्कड़!!
ये चाल और तेवर!!
जला डालेंगे उस रस्सी को हम
जिसमें है इतना बल।
पहचानती नहीं या जानती नहीं –
राजनीति और कूटनीति के सिद्धहस्त
हैं शकुनि, शुक्राचार्य के
वंशज हम॥
समझीं तुम, हाँ तुम –
ब्रुनो की बेटियाँ!! (हँसने की आवाज़)

ब्रुनो की बेटियाँ --चुप।
पहली बार हुआ अहसास
पिता के
उस दर्द का
जब
सत्य
और केवल सत्य बोलने के
जुर्म में
जला दिया गया था ज़िंदा
सबके सामने॥
धर्म का रक्षक
बना
सत्य के
उस वाहक का भक्षक॥
लेकिन –
उसी दर्द ने दी ताक़त बेटियों को
फिर एक बार –
सत्य जो अब तलाक़ था शांत
कर उठा हुंकार॥

बोली बेटियाँ फिर एक बार –
कभी जाति, कभी वर्ग,
कभी नस्ल, कभी खून,
कभी आस्था और कभी धर्म –
बना इन्हें ढाल
हमेशा करते रहे तुम
वार पर वार
मौक़ों की बिसात पर चलते रहे कुचक्र
करते रहे होम
हमारी अस्मिता का, पहचान का।
इस घृणित कार्य में
बने सब तुम्हारे संगी-साथी
महाम्ठाध्यक्ष
धर्माध्यक्ष
और अध्यक्षों के अध्यक्ष
राजध्यक्ष।
कितनी ही कर लो किलेबंदी
हो जाओ लामबंद, हथियारबंद
एकजुट
लेकिन –
अन्याय की लंका को तो
होना है ध्वस्त एक दिन।
सत्य है बस
अंगद का पैर
चिर- स्थिर॥
तुम्हारे दिये दंश –अपमान
ज़हर के प्याले भी
कर न सके बाल-बांका
ब्रुनो की बेटियों का॥

राजनीति और कूटनीति में निष्णात
शकुनि और शुक्राचार्य
किस मुगालते में हो तुम आज?
उतार फेंका है हमने
तुम्हारे उन दिलकश मुखौटों को
और ये रहा तुम्हारा
बेरहम, वीभत्स चेहरा।
ओ ! नीतिविहीन
अपनी ही बहन के कुल विनाशक!!
और, तुम?
राज और कूट के दिग्गज
क्या दे पाये
अपनी पुत्री देवयानी को
उसका प्रेम?
पर तुम्हें इसका अहसास कहाँ?
तुम्हारे हर शाह पर मात
फिर भी ये दंभ?
इससे क्या फर्क पड़ता है
महारानी एंतोनिओ
कि हम कौन हैं?
सवाल तो यह कि
हम क्या हैं और क्या होंगे।

और –
हाँ, सुन लिया हमने
कि रस्सी जला दी जाएगी
पर बल??!!
उसका क्या??
आख़िर ये ही तो है
हमारी विरासत
और,
जिसे तुम कहते हो तेवर
वही तो हैं
हमारे ज़ेवर।।
ब्रुनो कि बेटियों के ज़ेवर॥

लेकिन, अब बस
अंत तुम्हारा भी
आ ही गया –
क्या सुन सकते हो तुम
वो आवाज़ –
वो कोलाहल –
और कुछ ...
हाँ, कुछ
चरमराने कि
टूट कर बिखरने की
उस रुदन, सिसकन
और करूँ क्रंदन की आवाज़ –
पर इससे क्या?
इतिहास !
हाँ, इतिहास तो लेखा –जोखा है
कर्मों–कुकर्मों और दुष्कर्मों का
और-
देखो-
अपनी पितरओं की आत्माओं को
शांति के लिए
उनकी तड़पन
और
फल्गू नदी का किनारा -
ख़त्म होकर रहेंगी तुम्हारी सारी हेठियाँ
तुम्हारा भी तर्पण करेंगी
ब्रुनो की ये बेटियाँ
ब्रुनो की ये बेटियाँ॥ (बोल्ड किए नाम इतिहास प्रसिद्ध व्यक्ति के है)


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