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ISSN 2292-9754

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10.15.2016


तुम कहते हो

तुम कहते हो, तो जी लूँगी
अग्नि, पर्वत, गह्वर, खाई,
बरगद, पीपल, ताड़ और काई,
चढ़ी जहाँ से फिसल गई फिर,
रोज़-रोज़ की ज़िल्लत पायी।

ऊब गया संसार से दिल जब,
भाग रही थी साँसें आगे
तड़प रही थी जल बिन मछली,
जलती धूप, सुलगती धरती
नंगे पाँव, होश खो बैठे
कर न सके विराम मगर वो,
चलने को तैयार रहे थे
चलती लेकर जहाँ मुसाफ़िर,
कठपुतली थी जाने किसकी?

मूक, बधिर, सी बढ़ती जाती
छोड़ रहा था साथ जब तन का
मन को जबरन बाँध रही थी
मगर एक पल ऐसा आया,
लगा नहीं अब क़दम बढ़ेंगे
मगर बढ़ आयी थी मैं फिर भी,
चट्टानों के पास गिरी थी।

दूर खड़ा दरिया मुसकाया
प्यास गले अवरुद्ध पड़ी थी
आए तुम सौगात लिए कुछ
कहा- "अमृत रस है पी लो,
भूल जाओ पीछे के रस्ते,
आगे का पल हँस कर जी लो,
साथ रहूँगा हर पल तेरे,
और नया एक जीवन पायी।


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