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ISSN 2292-9754

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10.15.2016


परजीवी

छोड़ना क्या था
अभिमान ही न!
किस ज़माने की बात कर रहे हो?
राणा प्रताप के वंशज तो नहीं हम
न हरिश्चंद्र की ही औलाद,
इक्ष्वाकू कुल से कहीं कोई नाता नहीं।
शपथ ले लो गीता की तो मै करता हूँ
इसे तजने का वादा।

इसके लिए क्या काशी, क्या प्रयाग
गाज़ियाबाद की हिंडन नदी में ही दिया त्याग।
अब ये घर, ये परिवार, ये गाँव वाले
दुतकारते रहें हाथ में डंडे लिए
बनैले पशुओं की भाँति।
थक कर अपने घर जाएँगे वापस
हम पर कौन सी आएगी ऐसी आफ़त।

तो सन्नाटे और हवा को
सुना था मैंने फुसफुसाते
कुछ अपने, कुछ पराए गाँव में जाके
कि पराई संपत्ति पर यह कितना ऐंठा है
अपना छोड़ दूसरे की जागीर पर बैठा है।

हवाएँ तो बोलती ही रहेंगी,
इस कान से उस कान
उड़ा कर लुत्ती,
सरेआम डोलती ही रहेंगी।

सम्पन्न की माँ परेशान है
बुढ़ापा और अकेलापन,
धन देवी अब उसे डराती है
अवग्रह में है उसका प्राण।

फिर उठाएँ क्यों न फ़ायदा
मेरा क्या जाएगा,
इस बहती नदी से एक नहर खींचनी है
और
अपने गाँव के घर को,
परिजन को, बस सींचना है!!


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