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ISSN 2292-9754

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10.15.2016


नारी

पथराई हुई आँखें
दरवाज़े से बाहर
सड़क को उदास देखकर
अब कोई सवाल नहीं पूछती।
ख़ामोश है दोनों
सड़क और आँखें
सिमटती जा रही है एक दूसरे में
सड़क में आँखें, आँखों में सड़क
सड़कों को क्या पता
हिरनियाँ वहाँ से कब निर्भय
कुलाँचे भरती, हँसती हुई जाएँगी
आँखों को भी खबर कहाँ है
कि बाहर गए हुए की चिंता छोड़
वापस कब अपने कामों में
वह लग जाएँगी।


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