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ISSN 2292-9754

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10.15.2016


मन यायावर

वन–प्रांतरनदी नाले,
झील, समंदर, नाला, पोखरी,
अटक भटक कर लौट रहे जब-तब
मैंने पकड़ा था मन को।

क्यों इतना वाचाल हुआ तू?
क्यों तेरे पाँवों में चक्के?
टिक नहीं पाते कहीं क्यों पल भर?
कितने युग के जगे-जगे तुम
फिरते जैसे घूम रहे हो
आओ तुझको लोरी सुनाऊँ।
पर तुमको विश्राम कहाँ?
अपनी धुन में ही रहते हो,
पल-पल, क्षण-क्षण,पानी, पारा,
रूप अनेक बदल जाते।
मुसाफ़िरी करने को कर लो,
मस्तिष्क को विराम भी दे लो।
क्यों नहीं मिटते राह तुम्हारे?
पग चिन्ह सब आबाद रहे हैं
यही वजह बन जाती मुश्किल
रैन-दिवस का भेद न होता
तुम कितनी मन मानी करते
मन तुम क्यों विराम न लेते?

जोगी भी कहते हैं ऐसा
और भोगी की बात करूँ क्या,
तुमने सबके भ्रष्ट किए तप,
ऐसा सब आरोप लगाते।

क्या मैं बोलूँ और से तेरे
सच में तुमसे लोग दुखी हैं
तुम पर कहाँ काल का पहरा?
सदियो से आज़ाद रहे हो
आओ चैन की नींद सुला दूँ
तुमको सब बातें बिसरा दूँ
बन जाओ बस मीत हमारे
ओ मन प्यारे!
अब चंचल तुम तनिक न भाते
कितने कष्ट उठाए सबने
सब तेरा आराम चाहते
मन यायावर रुक तो जाते।


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